Barmer में अब आगोर भूमि मामले ने तूल पकड़ा, मैदान में कूदे Ravindra Bhati ने ऐसे किया बड़ा खुलासा

Edited By Anil Jangid, Updated: 28 Jun, 2026 02:14 PM

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बाड़मेर। पश्चिमी राजस्थान में ओरण भूमि बचाने को लेकर जबरदस्त मुहिम चलाने के बाद अब शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी आगोर भूमि मामले में भी कूदते नजर आ रहे हैं। दरअसल, सोशल मीडिया पर विधायक रविंद्र भाटी ने एक वीडियो पोस्ट किया है जिसमें देखा जा सकता है...

बाड़मेर। पश्चिमी राजस्थान में ओरण भूमि बचाने को लेकर जबरदस्त मुहिम चलाने के बाद अब शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी आगोर भूमि मामले में भी कूदते नजर आ रहे हैं। दरअसल, सोशल मीडिया पर विधायक रविंद्र भाटी ने एक वीडियो पोस्ट किया है जिसमें देखा जा सकता है कि किसी गांव में किसानों के खेतों में हाईटेंशन लाइन के खंभे गाड़ने के लिए गढ्ढे खोदे जा रहे है जिनका गांव वालों द्वारा पुरजोर विरोध किया जा रहा है। इसको लेकर विधायक भाटी ने अपनी पोस्ट में लिखा है कि पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर क्षेत्र की यह कहानी किसी एक गांव की नहीं, बल्कि कई गांवों में उठ रहे उस सवाल की झलक है, जो समय के साथ और गहरा होता जा रहा है, विकास किसके लिए और किस कीमत पर?

 

शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने लिखा कि सीताराम की ढाणी जैसे कुछ गांवों में लोग बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में तालाब की आगोर भूमि और सरकारी जमीन के उपयोग को लेकर कई विवाद सामने आए हैं। इन ग्रामीणों का कहना है कि जहां एक ओर लंबे समय से बसे गरीब परिवारों को अतिक्रमण के नाम पर हटाया गया, वहीं दूसरी ओर कुछ स्थानों पर बड़े प्रोजेक्ट्स और कंपनियों की गतिविधियों को लेकर अलग तरह की नरमी दिखाई दी।

 

भाटी ने लिखा कि एक तरफ़ जहां बाड़मेर आगोर में लंबे समय से बसे ग़रीब लोगों को तालाब की आगोर भूमि पर अतिक्रमण के नाम पर बेघर किया गया और उनके आशियाने उजाड़े गए। वही दूसरी ओर, सीताराम की ढाणी (शिव) में जब प्रशासन के चहेते कंपनी वाले तालाब की आगोर भूमि पर बिना किसी वैध कागज़ात के खंभे खड़े कर रहे थे और गाँव के लोगों ने विरोध दर्ज करवाया, तो बदले में गाँव के लोगों को ही जेल भेज दिया गया।

 

जब किसानों की सहमति के बिना उनके खेतों से हाईटेंशन लाइनें निकाली जाती हैं और बड़े प्लांट स्थापित करने के लिए दबाव बनाया जाता है, तब यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है। प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी किसके प्रति है? आमजन के प्रति या कंपनियों के प्रति?

 

क्या प्रशासन का दायित्व अपने अधिकारों तथा जल, जंगल और ज़मीन की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे आम नागरिकों के साथ खड़े होने का है, या फिर बड़ी कंपनियों के हितों की रक्षा करने का? इसके बाद रविंद्र सिंह लिखते हैं कि जनता जानना चाहती है कि आख़िर प्रशासन और पुलिस की जवाबदेही किसके प्रति है? आमजन के प्रति या कंपनियों के प्रति?

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