Edited By Anil Jangid, Updated: 17 Jul, 2026 02:59 PM

जयपुर। राजस्थान सरकार ने सरकारी नौकरियों में दिव्यांग आरक्षण का लाभ लेने वाले अभ्यर्थियों और सेवारत कर्मचारियों के लिए दिव्यांगता प्रमाण पत्रों की जांच प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी एवं सख्त बनाने का फैसला किया है। अब सरकारी नौकरी के लिए किसी भी...
जयपुर। राजस्थान सरकार ने सरकारी नौकरियों में दिव्यांग आरक्षण का लाभ लेने वाले अभ्यर्थियों और सेवारत कर्मचारियों के लिए दिव्यांगता प्रमाण पत्रों की जांच प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी एवं सख्त बनाने का फैसला किया है। अब सरकारी नौकरी के लिए किसी भी सामान्य अस्पताल से जारी दिव्यांगता प्रमाण पत्र को अंतिम रूप से मान्य नहीं माना जाएगा। इसके स्थान पर प्रदेश के सभी सात संभागीय मुख्यालयों पर गठित विशेष मेडिकल बोर्ड द्वारा दिव्यांगता का सत्यापन अनिवार्य होगा।
यह निर्णय राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा अमन बनाम राज्य एवं अन्य मामले में दिए गए अंतरिम आदेश के अनुपालन में लिया गया है। कार्मिक विभाग की शासन सचिव अर्चना सिंह ने इस संबंध में निर्देश जारी करते हुए चिकित्सा विभाग और भर्ती एजेंसियों को नई व्यवस्था लागू करने को कहा है।
नई व्यवस्था के तहत जयपुर, जोधपुर, अजमेर, बीकानेर, कोटा, उदयपुर और भरतपुर स्थित मेडिकल कॉलेजों एवं उनसे संबद्ध अस्पतालों में विशेष दिव्यांगता सत्यापन बोर्ड गठित किए जाएंगे। इन बोर्डों में असिस्टेंट प्रोफेसर या उससे वरिष्ठ स्तर के विशेषज्ञ चिकित्सकों को शामिल किया जाएगा। साथ ही सभी मेडिकल कॉलेजों को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप दिव्यांगता मापने वाले आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित किया जाएगा। जांच के दौरान संबंधित विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपस्थिति भी अनिवार्य होगी।
सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए भी नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। अब राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC), राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड (RSSB) और अन्य भर्ती एजेंसियों द्वारा जारी विज्ञापनों में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाएगा कि चयनित अभ्यर्थियों की दिव्यांगता का अंतिम सत्यापन केवल संभागीय मेडिकल बोर्ड द्वारा किया जाएगा। इसके अलावा भर्ती प्रक्रिया में आवेदन करने वाले प्रत्येक दिव्यांग अभ्यर्थी के पास वैध यूनिक डिसएबिलिटी आईडी (UDID) कार्ड होना भी अनिवार्य रहेगा।
यदि किसी उम्मीदवार के पास पहले से जारी दिव्यांगता प्रमाण पत्र है, तब भी उसकी पात्रता का अंतिम निर्णय नए मेडिकल बोर्ड द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार की गई जांच के बाद ही होगा। इसका उद्देश्य फर्जी प्रमाण पत्रों पर रोक लगाना और वास्तविक पात्र अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ सुनिश्चित करना है।
राज्य सरकार ने पहले से सेवा में कार्यरत दिव्यांग कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए भी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यदि पुनः सत्यापन के दौरान पुराने और नए दिव्यांगता प्रतिशत में अंतर पाया जाता है, तो कर्मचारी की पात्रता का निर्धारण उसके चयन के समय लागू मेडिकल मानकों के आधार पर किया जाएगा। इससे पहले से नियुक्त कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है।
सरकार ने पारदर्शिता बनाए रखने के लिए अपीलीय सत्यापन मेडिकल बोर्ड बनाने का भी प्रावधान किया है। यदि कोई अभ्यर्थी या सेवारत कर्मचारी प्रारंभिक मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट या निर्धारित दिव्यांगता प्रतिशत से संतुष्ट नहीं होता है, तो वह संभागीय स्तर पर गठित अपीलीय मेडिकल बोर्ड में अपील कर सकेगा। इस बोर्ड की अध्यक्षता अतिरिक्त प्राचार्य या मेडिकल अधीक्षक करेंगे और इसमें प्रारंभिक बोर्ड से वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे। सरकार का मानना है कि इस नई व्यवस्था से फर्जीवाड़े पर अंकुश लगेगा और दिव्यांग आरक्षण का लाभ केवल वास्तविक पात्र लोगों तक ही पहुंच सकेगा।