कोटा में राहुल गांधी : क्या युवाओं की आवाज़ बनेगी राष्ट्रीय एजेंडा या सिर्फ चुनावी मुद्दा? | Editor's Take

Edited By Kuldeep Kundara, Updated: 17 Jun, 2026 06:49 PM

rahul gandhi in kota  editor s take

जयपुर | आज 17 जून 2026 को राहुल गांधी कोटा आ रहे हैं। कांग्रेस ने अपनी नई मुहिम ‘छात्रों की गूंज’ की शुरुआत के लिए कोटा को चुना है। वजह भी साफ है। कोटा सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि देश के लाखों छात्रों के सपनों, संघर्षों और दबाव का केंद्र है।

जयपुर | आज 17 जून 2026 को राहुल गांधी कोटा आ रहे हैं। कांग्रेस ने अपनी नई मुहिम ‘छात्रों की गूंज’ की शुरुआत के लिए कोटा को चुना है। वजह भी साफ है। कोटा सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि देश के लाखों छात्रों के सपनों, संघर्षों और दबाव का केंद्र है। यहां हर साल हजारों युवा डॉक्टर और इंजीनियर बनने का सपना लेकर आते हैं, लेकिन इसी के साथ वे परीक्षा व्यवस्था की खामियों, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और मानसिक तनाव जैसी चुनौतियों का भी सामना करते हैं।

कांग्रेस का कहना है कि इस अभियान का मकसद पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियां, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाना है। ये ऐसे मुद्दे हैं जिनसे लगभग हर युवा किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है।

लेकिन राहुल गांधी के आने से पहले ही राजनीति गर्म हो गई है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि उनके कार्यक्रम से जुड़े पोस्टर हटाए गए और कुछ कोचिंग संस्थानों पर दबाव बनाया गया। भाजपा इन आरोपों को खारिज कर रही है। सच जो भी हो, इतना जरूर है कि कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही राजनीतिक माहौल काफी तीखा हो चुका है।

इस दौरे की एक और दिलचस्प बात है। कोटा लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला करते हैं। आमतौर पर स्पीकर को राजनीतिक विवादों से ऊपर और निष्पक्ष संस्था के रूप में देखा जाता है। वहीं राहुल गांधी देश के नेता प्रतिपक्ष हैं और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना उनकी जिम्मेदारी है। ऐसे में स्पीकर के संसदीय क्षेत्र में आकर युवाओं के मुद्दों पर सरकार को घेरना अपने आप में एक खास राजनीतिक और संसदीय संदेश देता है। अब सवाल यह है कि क्या यह अभियान सिर्फ राजनीतिक कार्यक्रम बनकर रह जाएगा या वास्तव में युवाओं के मुद्दों को आगे बढ़ाएगा?

क्योंकि कोटा और देश के लाखों युवाओं की परेशानियां बिल्कुल वास्तविक हैं। पेपर लीक की खबरें बार-बार सामने आती हैं। भर्ती परीक्षाएं वर्षों तक अटकी रहती हैं। कई युवा उम्र निकल जाने तक नौकरी का इंतजार करते रहते हैं। कोचिंग का बढ़ता खर्च परिवारों पर आर्थिक बोझ डालता है और लगातार बढ़ता दबाव छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। इन समस्याओं का समाधान केवल भाषणों या नारों से नहीं निकलने वाला।

कांग्रेस इस अभियान के जरिए खुद को युवाओं की आवाज़ के रूप में पेश करना चाहती है। लेकिन उसकी अपनी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच लंबे समय से चली आ रही खींचतान समय-समय पर सामने आती रही है। जब पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता और बदलाव की बात करती है, तब राज्य स्तर पर दिखाई देने वाली गुटबाजी उसके संदेश को कमजोर कर सकती है।

आखिरकार, कोटा का यह दौरा केवल राहुल गांधी की सभा या कांग्रेस के अभियान की शुरुआत भर नहीं है। यह इस बात की भी परीक्षा है कि क्या विपक्ष युवाओं के मुद्दों को लगातार और गंभीरता से उठा पाएगा, क्या वह केवल विरोध की राजनीति से आगे बढ़कर समाधान की बात करेगा, और क्या वह खुद को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित कर पाएगा।

युवाओं को राजनीतिक भाषणों से ज्यादा जवाब चाहिए। उन्हें यह जानना है कि पेपर लीक कैसे रुकेगा, भर्तियां समय पर कैसे होंगी, रोजगार के अवसर कैसे बढ़ेंगे और शिक्षा व्यवस्था अधिक भरोसेमंद कैसे बनेगी। अगर ‘छात्रों की गूंज’ इन सवालों को देश की राजनीति के केंद्र में ला पाती है, तो यह अभियान सफल माना जाएगा। लेकिन अगर यह भी सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप और चुनावी बयानबाजी तक सीमित रह गया, तो युवाओं की निराशा और बढ़ सकती है। आज कोटा में असली मुद्दा राजनीति नहीं, बल्कि युवाओं का भविष्य है। और यही तय करेगा कि इस अभियान की गूंज कितनी दूर तक सुनाई देती है.

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