Edited By Anil Jangid, Updated: 03 Feb, 2026 04:46 PM

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिगों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों और पॉक्सो एक्ट के कठोर प्रावधानों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है। जस्टिस अनिल कुमार उपमन की पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और कानून...
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिगों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों और पॉक्सो एक्ट के कठोर प्रावधानों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है। जस्टिस अनिल कुमार उपमन की पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और कानून निर्माताओं को सुझाव दिया कि देश में ‘रोमियो-जूलियट कानून’ की आवश्यकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कठोर कानूनों का अंधाधुंध प्रयोग न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों किशोर आपसी सहमति से रिश्ते में थे, लेकिन लड़की की उम्र 18 वर्ष से कुछ कम होने के कारण इसे कानूनी दृष्टि से गंभीर यौन अपराध माना गया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रखर गुप्ता ने कोर्ट में प्रभावी तर्क प्रस्तुत किया। कोर्ट ने परिस्थितियों का गहन अध्ययन करने के बाद युवक के खिलाफ दर्ज FIR और चल रही कानूनी कार्यवाही को पूरी तरह से रद्द करने का आदेश दिया।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामलों का एक बड़ा हिस्सा ‘रोमियो-जूलियट’ प्रकृति का होता है। अक्सर इसमें दो किशोर या एक किशोर और एक युवा आपसी सहमति से संबंध में होते हैं, लेकिन लड़की की उम्र 18 वर्ष से कुछ कम होने की वजह से यह कानूनन यौन शोषण की श्रेणी में डाल दिया जाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में ऐसी धारा (Romeo-Juliet Provision) जोड़ी जानी चाहिए जो यह अंतर कर सके कि वास्तव में शोषण कहाँ हुआ और कहाँ मामला केवल आपसी सहमति वाले किशोर संबंधों का है।
जस्टिस उपमन ने अपने फैसले में कानून निर्माताओं को चेतावनी दी कि पॉक्सो जैसे कठोर कानून बच्चों को हिंसक अपराधियों से बचाने के लिए हैं, न कि युवाओं के सहमति आधारित रिश्तों को अपराध घोषित करने के लिए। अदालत ने कहा कि कानून का अंधाधुंध प्रयोग समाज में अन्याय को बढ़ावा देगा और युवाओं का भविष्य बर्बाद कर सकता है।
इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट के पहले सुझावों को भी समर्थन मिला, जिसमें किशोर प्रेम संबंधों में पॉक्सो के दुरुपयोग और इसके सामाजिक प्रभावों पर चिंता जताई गई थी। राजस्थान हाईकोर्ट ने अब केंद्र सरकार को यह सख्त संदेश दिया है कि किशोरावस्था के स्वाभाविक व्यवहार को अपराधीकरण की श्रेणी में डालना युवाओं के मानसिक और सामाजिक जीवन के लिए हानिकारक है।