गोल्डन आवर ने बचाई जान: जयपुर में अज्ञात बुजुर्ग को समय पर इलाज से मिली नई जिंदगी

Edited By Kuldeep Kundara, Updated: 11 Jul, 2026 06:46 PM

golden hour saved lives

राजधानी जयपुर में मानवता, पुलिस की तत्परता और चिकित्सकों की समय पर कार्रवाई का एक प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है।

जयपुर। राजधानी जयपुर में मानवता, पुलिस की तत्परता और चिकित्सकों की समय पर कार्रवाई का एक प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है। जवाहर सर्किल क्षेत्र में सड़क किनारे अचेत अवस्था में मिले करीब 70 वर्षीय एक अज्ञात बुजुर्ग को समय पर इलाज मिलने से नया जीवन मिल गया। जब उन्हें अस्पताल लाया गया, तब वे न बोल पा रहे थे और न ही अपनी पहचान बता पा रहे थे। लेकिन गोल्डन आवर के भीतर मिले उपचार ने उनकी आवाज और पहचान दोनों वापस लौटा दी।

जानकारी के अनुसार, बुजुर्ग सड़क किनारे अचेत अवस्था में मिले थे। सूचना मिलने पर पुलिसकर्मी बिना देरी किए उन्हें फोर्टिस हॉस्पिटल जयपुर की इमरजेंसी में लेकर पहुंचे। उस समय उनकी स्थिति गंभीर थी और उनके साथ कोई परिजन भी मौजूद नहीं था। इसके बावजूद अस्पताल की मेडिकल टीम ने औपचारिकताओं में समय गंवाए बिना तुरंत उपचार शुरू कर दिया।

अस्पताल पहुंचते ही इमरजेंसी और न्यूरोलॉजी विभाग ने 'स्ट्रोक कोड' सक्रिय किया। आवश्यक जांच और ब्रेन इमेजिंग के बाद पता चला कि बुजुर्ग एक्यूट इस्केमिक स्ट्रोक (Acute Ischemic Stroke) से पीड़ित हैं। राहत की बात यह रही कि उन्हें स्ट्रोक के उपचार के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय सीमा यानी गोल्डन आवर के भीतर अस्पताल पहुंचा दिया गया था।

न्यूरोलॉजी टीम ने तुरंत इंट्रावेनस थ्रोम्बोलाइसिस (IV Thrombolysis) उपचार शुरू किया। इलाज के कुछ समय बाद ही सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगे। बुजुर्ग की बोली लौट आई और उन्होंने अपना नाम और पता बताया, जिसके बाद अस्पताल प्रशासन उनके परिजनों से संपर्क करने में सफल रहा। अपने परिजन को स्वस्थ देखकर परिवार ने पुलिस और चिकित्सकों का आभार जताया।

फोर्टिस हॉस्पिटल जयपुर की डायरेक्टर (न्यूरोलॉजी) डॉ. नीतू रामरखियानी ने कहा कि स्ट्रोक के मामलों में हर मिनट बेहद महत्वपूर्ण होता है। समय पर इलाज मिलने से मरीज के मस्तिष्क को स्थायी नुकसान से बचाया जा सकता है और इस मामले में गोल्डन आवर के भीतर उपचार मिलना मरीज की जान बचाने में निर्णायक साबित हुआ।

वहीं फोर्टिस हॉस्पिटल जयपुर के डायरेक्टर डॉ. मनीष कुमार अग्रवाल ने कहा कि आपातकालीन चिकित्सा में मरीज का जीवन सबसे पहले आता है। मरीज की पहचान नहीं होने के बावजूद अस्पताल की टीम ने बिना किसी देरी के इलाज शुरू किया, जबकि पुलिस की त्वरित कार्रवाई ने भी इस जीवनरक्षक प्रयास में अहम भूमिका निभाई।

यह घटना इस बात का उदाहरण है कि यदि पुलिस, डॉक्टर और आमजन समय पर मिलकर कार्य करें तो गंभीर स्थिति में भी किसी की जान बचाई जा सकती है। अस्पताल ने लोगों से अपील की है कि यदि किसी व्यक्ति में अचानक चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ-पैर में कमजोरी, बोलने में कठिनाई, संतुलन बिगड़ना या अचानक बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे स्ट्रोक का संकेत मानते हुए तुरंत स्ट्रोक उपचार सुविधा वाले अस्पताल पहुंचाएं।

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