रेवड़ियों की तरह बंटे VIP नंबर, 500 करोड़ का नुकसान: राजस्थान परिवहन विभाग का थ्री-डिजिट घोटाला बेनकाब!

Edited By Payal Choudhary, Updated: 05 Jan, 2026 06:27 PM

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राजस्थान परिवहन विभाग में लंबे समय से दबा पड़ा थ्री-डिजिट VIP नंबर घोटाला अब आधिकारिक तौर पर सामने आ गया है। जयपुर के गांधीनगर थाने में इस मामले की पहली FIR दर्ज होने के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है।

राजस्थान परिवहन विभाग में लंबे समय से दबा पड़ा थ्री-डिजिट VIP नंबर घोटाला अब आधिकारिक तौर पर सामने आ गया है। जयपुर के गांधीनगर थाने में इस मामले की पहली FIR दर्ज होने के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है। आरोप है कि अधिकारियों और कर्मचारियों ने मिलीभगत कर नियमों को दरकिनार करते हुए VIP और मनचाहे थ्री-डिजिट नंबरों का अवैध आवंटन किया, जिससे सरकार को करीब 500 करोड़ रुपये का भारी आर्थिक नुकसान हुआ।

यह FIR RTO (प्रथम) राजेंद्र सिंह शेखावत की शिकायत पर दर्ज की गई है। FIR के मुताबिक, यह घोटाला कोई एक-दो मामलों तक सीमित नहीं था, बल्कि वर्षों से सुनियोजित तरीके से चल रहा था। सरकारी रिकॉर्ड में जानबूझकर हेराफेरी की गई, फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और नियमों को ताक पर रखकर खास लोगों को VIP नंबर प्लेट उपलब्ध कराई गईं।

जांच में सामने आया है कि थ्री-डिजिट नंबरों का आवंटन तय प्रक्रिया और निर्धारित शुल्क के बिना किया गया। जिन नंबरों से सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व मिल सकता था, उन्हें निजी लाभ के लिए बांट दिया गया। इसी कारण परिवहन विभाग को करीब 500 करोड़ रुपये की चपत लगने का अनुमान लगाया गया है।

इस मामले में कुल 39 लोगों को आरोपी बनाया गया है। FIR में संयुक्त आयुक्त, RTO, ARTO, DTO, संस्थापन अधिकारी, लिपिक और अन्य कर्मचारी शामिल हैं। इससे साफ हो गया है कि यह घोटाला केवल निचले स्तर पर नहीं, बल्कि विभाग के उच्च पदों तक फैला हुआ था। कई जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों की भूमिका अब जांच के दायरे में है।

इस पूरे मामले का खुलासा RTO (प्रथम) राजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा की गई गहन आंतरिक जांच के बाद हुआ। पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए, फाइलों का क्रॉस-वेरिफिकेशन किया गया और संदिग्ध VIP नंबर आवंटनों की सूची तैयार की गई। बताया जा रहा है कि यह केस लंबे समय से लंबित था, लेकिन राज्य सरकार के सख्त रुख के बाद अब इस पर ठोस कार्रवाई शुरू हुई है।

सूत्रों का कहना है कि यह कार्रवाई सिर्फ जयपुर तक सीमित नहीं रहेगी। आने वाले दिनों में राजस्थान के अन्य जिलों के परिवहन कार्यालयों में भी इसी तरह के मामलों की जांच की जा सकती है और नई FIR दर्ज होने की संभावना है। जांच एजेंसियां पूरे सिस्टम में हुए संभावित घोटालों की परतें खोलने में जुटी हुई हैं।

यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि VIP कल्चर किस तरह सरकारी तंत्र को अंदर से कमजोर करता है। जब निगरानी तंत्र कमजोर हो और पारदर्शिता न हो, तो सरकारी रिकॉर्ड ही भ्रष्टाचार का हथियार बन जाते हैं। इस घोटाले ने प्रशासनिक जवाबदेही और ऑडिट सिस्टम की खामियों को उजागर कर दिया है।

अब असली सवाल यह है कि इतने सालों तक इस घोटाले पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई। 500 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई कौन करेगा। क्या जांच केवल FIR तक सीमित रहेगी या दोषियों से सरकारी धन की वसूली और सख्त सजा भी सुनिश्चित की जाएगी। अगर कार्रवाई सिर्फ छोटे कर्मचारियों तक सिमट गई और बड़े चेहरे बच गए, तो यह मामला एक मिसाल नहीं बल्कि सिस्टम पर एक और सवाल बनकर रह जाएगा।

फिलहाल इतना तय है कि VIP नंबर प्लेट पर नहीं, VIP ईमानदारी सिस्टम में होनी चाहिए। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि यह FIR केवल कागजों तक सीमित रहती है या वास्तव में राजस्थान परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार के इस खेल पर लगाम कस पाती है।

 

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