Edited By Anil Jangid, Updated: 14 Jan, 2026 04:18 PM

हिण्डौनसिटी। सेण्ड स्टोन के लिए पहचान रखने वाला करौली जिला अब कृषि क्षेत्र में भी नई ऊँचाइयों को छू रहा है। अनुकूल मौसम और उपजाऊ मिट्टी के बेहतर संयोग ने जिले को सरसों उत्पादन के क्षेत्र में एक अलग पहचान दिलाई है। वर्ष-दर-वर्ष बढ़ते बुवाई रकबे और...
हिण्डौनसिटी। सेण्ड स्टोन के लिए पहचान रखने वाला करौली जिला अब कृषि क्षेत्र में भी नई ऊँचाइयों को छू रहा है। अनुकूल मौसम और उपजाऊ मिट्टी के बेहतर संयोग ने जिले को सरसों उत्पादन के क्षेत्र में एक अलग पहचान दिलाई है। वर्ष-दर-वर्ष बढ़ते बुवाई रकबे और बेहतर उपज से किसानों की आमदनी में इजाफा हो रहा है, जिससे जिले का किसान खुशहाल होता नजर आ रहा है।
राज्य सरकार की “मेरा जिला मेरी फसल” योजना के तहत करौली में सरसों आधारित कृषि को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके अंतर्गत जिले में बड़ी ऑयल प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है, ताकि सरसों उत्पादन से न केवल किसानों और व्यापारियों को लाभ मिले, बल्कि कृषि आधारित उद्योगों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो सकें।
सरसों बनी जिले की प्रमुख फसल
करौली जिले में अन्य फसलों की तुलना में सरसों की खेती सबसे अधिक की जाती है। कम लागत में अधिक मुनाफा मिलने के कारण किसानों का रुझान लगातार सरसों की ओर बढ़ रहा है। औसतन जिले में 1.05 से 1.10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सरसों की खेती होती है। हालांकि, इस बार नादौती क्षेत्र में बुवाई के बाद लंबे समय तक जलभराव रहने से सरसों का रकबा कुछ कम रहा। जिले में इस वर्ष 95 हजार हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले 91,180 हेक्टेयर में सरसों की बुवाई हुई है, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 1.11 लाख हेक्टेयर था।
तेल की मात्रा बनी खास पहचान
इन दिनों जिले के खेत पीले फूलों से लकदक हैं और सरसों की फसल में फलियों के अंदर दाने भरने लगे हैं। करौली जिले की सरसों की सबसे बड़ी खासियत इसकी गुणवत्ता है। यहां उत्पादित सरसों में औसतन 40 से 45 प्रतिशत तक तेल की मात्रा पाई जाती है। खासकर मांड क्षेत्र की सरसों में तेल की मात्रा 45 से 46 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। बेहतर गुणवत्ता के कारण यहां की सरसों को ऑयल मिलों और दूसरे राज्यों में विशेष रूप से पसंद किया जाता है।
किसानों को अच्छी उपज की उम्मीद
गांव ढिढोरा के किसान रमेशचंद शर्मा और विष्णु डागुर बताते हैं कि आमतौर पर चौबीसा क्षेत्र में रबी सीजन में गेहूं की अधिक बुवाई होती है, लेकिन इस बार मानसून समय पर आने से किसानों ने बाजरा कटाई के तुरंत बाद सरसों की बुवाई कर दी। आज खेतों में पीली चुनरिया ओढ़े सरसों की फसल देखकर किसानों को अच्छी पैदावार की पूरी उम्मीद है।
विशेषज्ञों की राय
कृषि विभाग के सेवानिवृत्त संयुक्त निदेशक वी.डी. शर्मा के अनुसार, करौली जिले की जलवायु और मिट्टी सरसों की फसल के लिए बेहद अनुकूल है। इसमें खराबे की संभावना कम होती है, भंडारण आसान है और मंडियों में अच्छे भाव मिलते हैं। यही वजह है कि जिले में रबी और खरीफ—दोनों सीजन में सरसों मुख्य फसल के रूप में स्थापित हो चुकी है।
कुल मिलाकर, करौली जिले में लहलहाती सरसों न केवल खेतों को पीली चुनरिया से सजा रही है, बल्कि किसानों के जीवन में समृद्धि और खुशहाली के नए रंग भी भर रही है।