स्वामी विवेकानंद और राजस्थान: अलवर से खेतड़ी तक साधना, मित्रता और नामकरण की ऐतिहासिक यात्रा

Edited By Anil Jangid, Updated: 12 Jan, 2026 01:58 PM

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जयपुर। स्वामी विवेकानंद का राजस्थान से गहरा आध्यात्मिक और ऐतिहासिक संबंध रहा है। वे कई बार राजस्थान आए और अलवर, माउंट आबू, खेतड़ी, अजमेर व पुष्कर जैसे स्थानों पर प्रवास किया। 1891 में अपनी पहली यात्रा के दौरान वे अलवर में 49 दिनों तक रुके और माउंट...

जयपुर। स्वामी विवेकानंद का राजस्थान से गहरा और अविस्मरणीय आध्यात्मिक तथा ऐतिहासिक संबंध रहा है। उनकी राजस्थान यात्राएं केवल प्रवास भर नहीं थीं, बल्कि उनके वैचारिक, आध्यात्मिक और वैश्विक व्यक्तित्व के निर्माण में मील का पत्थर साबित हुईं। अलवर, माउंट आबू, खेतड़ी, अजमेर और पुष्कर जैसे पावन स्थलों से जुड़ी उनकी स्मृतियां आज भी राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न हिस्सा हैं।

 

स्वामी विवेकानंद पहली बार वर्ष 1891 में राजस्थान आए। इस यात्रा के दौरान उन्होंने अलवर में लगभग 49 दिनों तक प्रवास किया। यहां वे डॉ. गुरचरण लश्कर के आवास पर ठहरे और गहन चिंतन एवं आत्ममंथन में लीन रहे। अलवर प्रवास के बाद वे माउंट आबू पहुंचे, जहां नक्की झील के समीप स्थित चंपा गुफा में उन्होंने कठोर साधना की। माउंट आबू की शांत और आध्यात्मिक वातावरण वाली पहाड़ियां उनके चिंतन को नई दिशा देने वाली साबित हुईं।

 

माउंट आबू से आगे स्वामी विवेकानंद खेतड़ी पहुंचे, जहां उनका जीवन एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचा। खेतड़ी नरेश अजीत सिंह से उनकी ऐतिहासिक भेंट हुई, जो आगे चलकर गहरी मित्रता में परिवर्तित हो गई। अजीत सिंह न केवल विवेकानंद के विचारों से प्रभावित हुए, बल्कि उनके सबसे बड़े समर्थक भी बने। खेतड़ी नरेश ने ही ‘नरेंद्र’ नाम से जाने जाने वाले इस युवा संन्यासी को ‘विवेकानंद’ नाम दिया, जो आगे चलकर विश्व मंच पर भारतीय दर्शन का प्रतीक बना।

 

इतना ही नहीं, शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में भाग लेने के लिए अमेरिका यात्रा का मार्ग भी राजस्थान की धरती से ही प्रशस्त हुआ। खेतड़ी नरेश अजीत सिंह ने स्वामी विवेकानंद को अमेरिका जाने के लिए प्रेरित किया और उनकी यात्रा का खर्च भी स्वयं वहन किया। यही वह अवसर था, जब विवेकानंद ने शिकागो में ऐतिहासिक भाषण देकर भारत की आध्यात्मिक चेतना को विश्व पटल पर स्थापित किया।

 

अमेरिका से ऐतिहासिक सफलता प्राप्त कर लौटने के बाद भी स्वामी विवेकानंद वर्ष 1897 में पुनः राजस्थान आए। इस दौरान उन्होंने अलवर और खेतड़ी में प्रवास कर अपने पुराने संबंधों को और प्रगाढ़ किया। साथ ही अजमेर और पुष्कर की यात्राओं के माध्यम से उन्होंने राजस्थान की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को निकट से अनुभव किया।

 

कुल मिलाकर, राजस्थान की भूमि स्वामी विवेकानंद के जीवन में केवल एक यात्रा स्थल नहीं, बल्कि उनके आध्यात्मिक जागरण और वैश्विक विचार यात्रा की आधारशिला रही। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि विवेकानंद के विश्वविजयी विचारों के बीज राजस्थान की मरुधरा में ही पनपे, जिन्होंने आगे चलकर पूरे विश्व को भारतीय दर्शन की शक्ति से परिचित कराया।

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