राजस्थान: वीसी नियुक्ति पर राज्यपाल को हाईकोर्ट का नोटिस, 3 हफ्ते में जवाब तलब!

Edited By Payal Choudhary, Updated: 27 Feb, 2026 08:05 PM

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राजस्थान में कुलगुरु (वाइस चांसलर) की नियुक्ति को लेकर विवाद गहरा गया है। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्यपाल एवं कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब मांगा है। यह आदेश जस्टिस आनंद शर्मा की अदालत ने डॉ. आर.के. बाघेरवाल की याचिका पर...

राजस्थान में कुलगुरु (वाइस चांसलर) की नियुक्ति को लेकर विवाद गहरा गया है। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्यपाल एवं कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब मांगा है। यह आदेश जस्टिस आनंद शर्मा की अदालत ने डॉ. आर.के. बाघेरवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए 25 फरवरी को दिया।

याचिका में राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ वेटेनरी एंड एनिमल साइंसेज (राजुवास) में कुलगुरु की नियुक्ति को चुनौती दी गई है। राज्यपाल ने 4 सितंबर 2025 को डॉ. सुमंत व्यास को वीसी नियुक्त किया था। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह नियुक्ति यूजीसी नियमों के विपरीत है और इसे निरस्त किया जाना चाहिए।

सर्च कमेटी की वैधता पर सवाल

अधिवक्ता दिनेश यादव ने अदालत को बताया कि 3 मई 2025 को वीसी चयन के लिए सर्च कमेटी गठित कर विज्ञापन जारी किया गया था। याचिका में कहा गया है कि यूजीसी गाइडलाइंस के अनुसार सर्च कमेटी का चेयरमैन संबंधित विश्वविद्यालय से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा नहीं होना चाहिए। लेकिन कमेटी का अध्यक्ष प्रोफेसर त्रिभुवन शर्मा को बनाया गया, जो विश्वविद्यालय के एनिमल न्यूट्रिशन विभाग में एचओडी रह चुके हैं। इसे नियमों का उल्लंघन बताया गया है।

10 साल के टीचिंग अनुभव पर विवाद

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि नियुक्त वीसी डॉ. सुमंत व्यास के पास आवश्यक 10 वर्ष का शिक्षण अनुभव नहीं है, जो कुलगुरु पद के लिए अनिवार्य माना जाता है। इसी आधार पर नियुक्ति को अवैध करार देते हुए रद्द करने की मांग की गई है।

गौरतलब है कि डॉ. सुमंत व्यास ने वैज्ञानिक के रूप में राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र (NRCC) में सेवाएं दी हैं और बाद में जोधपुर स्थित केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के निदेशक भी रहे हैं।

फिलहाल हाईकोर्ट ने राज्यपाल, विश्वविद्यालय प्रशासन, रजिस्ट्रार और राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद संभावित है। यह केस प्रदेश में विश्वविद्यालय नियुक्तियों की पारदर्शिता और यूजीसी नियमों के पालन पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।

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