Edited By Anil Jangid, Updated: 28 Nov, 2025 03:50 PM

राजस्थान में अब परिवहन विभाग के कार्मिकों और अफसरों पर सरकार की गाज गिरने वाली है। क्योंकि फर्जीवाड़ा करने पर 450 अफसर-कार्मिकों पर अब FIR दर्ज होने वाली है। परिवहन विभाग में थ्री डिजिट वीआईपी नंबरों के फर्जीवाड़े की परतें खुल गई हैं। परिवहन विभाग...
जयपुर। राजस्थान में अब परिवहन विभाग के कार्मिकों और अफसरों पर सरकार की गाज गिरने वाली है। क्योंकि फर्जीवाड़ा करने पर 450 अफसर-कार्मिकों पर अब FIR दर्ज होने वाली है। परिवहन विभाग में थ्री डिजिट वीआईपी नंबरों के फर्जीवाड़े की परतें खुल गई हैं। परिवहन विभाग में यह अभी का सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा है जो सामने आया है। विभाग ने करीब 450 से अधिक अफसर और कार्मिकों को चिन्हित कर लिया है।
राजस्थान परिवहन विभाग के इन भ्रष्ट कार्मिकों और अफसरों के खिलाफ एफआईआर कराने के निर्देश दिए जा चुके हैं। निर्देशों के बाद राज्य से सभी आरटीओ- डीटीओ कार्यालयों में फर्जीवाड़े में लिप्त कार्मिकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू हो गई है। जयपुर में सबसे अधिक अफसरों और कार्मिकों के खिलाफ 32 मामले दर्ज कराए जा रहे हैं। आलम यह है कि परिवहन विभाग में हुए इस फर्जीवाड़े में हर तीसरा अफसर-कार्मिक दोषी पाया गया है। इनमें से किसी ने पैसों के लालच में तो किसी ने उच्च स्तर पर दवाब के बाद नंबरों में फर्जीवाड़ा किया।
विभाग की ओर से कानूनी कार्रवाई के निर्देश देने के बाद एक ओर जहां पुलिस इस प्रकरण को लेकर हरकत में आ गई है। वहीं, ईडी और एसीबी भी मामले में सक्रिय हो गई है। ईडी ने परिवहन विभाग से मामले में जानकारी भी मांगी है।
परिवहन विभाग की ओर से फर्जीवाड़े के मामले में गठित जांच कमेटी ने प्रदेश में 10 हजार वीआईपी नंबरों के हेरफेर की आशंका जताई है। कमेटी ने इस पूरे फर्जीवाड़े में सरकार को 500 से 600 करोड़ रुपए की राजस्व हानि का होना भी पाया है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि आरटीओ कार्यालयों में वीआईपी नंबरों को नियम विरुद्ध पंजीयन कर बेच दिया गया। आरसी और आधार सहित अन्य फर्जी दस्तावेजों से वाहनों को बेचा गया।
दरअसल, जयपुर आरटीओ प्रथम में बाबू और सूचना सहायक के फर्जीवाड़े की पोल खुली थी। इसके बाद जयपुर आरटीओ प्रथम राजेंद्र शेखावत ने मामले में जांच कराई तो 70 से अधिक थ्री डिजिट के नंबरों को फर्जी तरीके से दूसरे वाहनों के नाम करने का मामला समाने आया।
विभाग की ओर से सीरीज बंद करने और बिना वाहन मालिक की जानकारी के बाद भी अफसरों और बाबुओं ने दलालों के साथ मिलकर साल 1989 से पहले थ्री डिजिट के नंबरों को फर्जी तरीके से दूसरों के नाम कर दिया।
इतना ही नहीं फर्जीवाड़ा छुपाने के लिए आरटीओ कार्यालयों से रिकॉर्ड भी गायब करा दिया तो किसी ऑफिस में रिकॉर्ड ही जला दिया। इस काम में आरटीओे के एजेंट और बाबुओं की मिलीभगत अधिक रही। कुछ वीआईपी नंबरों को सांसद, विधायक, अफसरों और उद्योगपतियों ने भी खरीदा है। उच्च स्तर पर दबाव के बाद बाबुओं ने ऐसे नंबर जारी कर दिए। ऐसे में अब फर्जीवाड़ा करने वाले सभी अफसर नपने वाले हैं।