एक राजस्थान का गांव दिखा रहा राह: बामनवास कांकर ने कैसे पूरी तरह जैविक बनने का लिया फैसला

Edited By Anil Jangid, Updated: 02 Jan, 2026 06:47 PM

bamanwas kankar village go completely organic

कोटपूतली–बहरोड़। ऐसे समय में जब भारतीय कृषि मिट्टी के क्षरण, भूजल स्तर में गिरावट और रासायनिक खेती से जुड़ी बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही है, राजस्थान का एक छोटा सा गांव टिकाऊ बदलाव का सशक्त उदाहरण बनकर उभरा है। कोटपूतली–बहरोड़ जिले में स्थित...

कोटपूतली–बहरोड़। ऐसे समय में जब भारतीय कृषि मिट्टी के क्षरण, भूजल स्तर में गिरावट और रासायनिक खेती से जुड़ी बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही है, राजस्थान का एक छोटा सा गांव टिकाऊ बदलाव का सशक्त उदाहरण बनकर उभरा है। कोटपूतली–बहरोड़ जिले में स्थित बामनवास कांकर ग्राम पंचायत ने स्वच्छ और सुरक्षित भविष्य की दिशा में एक निर्णायक कदम उठाते हुए स्वयं को पूरी तरह जैविक प्रमाणित ग्राम पंचायत के रूप में स्थापित किया है। करीब 1,500 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि में फैली इस पंचायत की पूरी जमीन को जैविक प्रमाणन कार्यक्रम के तहत शामिल किया गया है। इसके साथ ही गांव के किसानों और पशुपालकों द्वारा पाले जा रहे 6,000 से अधिक पशुओं को भी जैविक प्रमाणन के अंतर्गत पंजीकृत किया गया है। इसके साथ बामनवास कांकर उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत की उन गिनी-चुनी ग्राम पंचायतों में शामिल हो गया है, जहां भूमि और पशुधन दोनों का जैविक प्रमाणन एक साथ किया गया है।

 

बामनवास कांकर को खास बनाता है इस बदलाव का व्यापक और पूर्ण स्वरूप। गांव में अब सभी कृषि गतिविधियां रासायनिक कीटनाशकों और कृत्रिम उर्वरकों से मुक्त हैं, वहीं पशुपालन पद्धतियां भी पर्यावरण और स्वास्थ्य के अनुकूल मानकों के अनुसार अपनाई जा रही हैं। यह समन्वित मॉडल यह सुनिश्चित करता है कि खेती, पशुपालन और पर्यावरण संरक्षण एक साथ आगे बढ़ें। जैविक खेती की यह यात्रा किसी बाहरी दबाव का परिणाम नहीं थी, बल्कि यह ग्रामीणों के सामूहिक संवाद और साझा चिंताओं से उपजी। किसानों ने महसूस किया कि मिट्टी की उर्वरता घट रही है, उत्पादन लागत बढ़ रही है और रसायनों के लगातार इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इन अनुभवों ने धीरे-धीरे सोच में बदलाव लाया—तत्काल लाभ से हटकर दीर्घकालीन टिकाऊ खेती की ओर।

 

इस परिवर्तन को दिशा देने में COFED (कोफार्मिन फेडरेशन ऑफ ऑर्गेनिक सोसायटीज़ एंड प्रोड्यूसर कंपनियां) की महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, टिकाऊ कृषि और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में कार्यरत इस संस्था ने किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, जागरूकता कार्यक्रम और संस्थागत सहयोग प्रदान किया। इससे किसानों को जैविक खेती की विधियों, प्रमाणन प्रक्रिया और बाजार तक पहुंच को समझने में मदद मिली। इस उपलब्धि को औपचारिक रूप से चिह्नित करने के लिए 2 जनवरी को बामनवास कांकर में “रासायनिक कृषि और पशुपालन के विरुद्ध संकल्प समारोह” आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में किसान, पशुपालक, स्थानीय जनप्रतिनिधि और COFED के प्रतिनिधि एक साथ आए। इस दौरान सभी ने कीटनाशक मुक्त खेती, जैविक पशुपालन और पर्यावरण-संवेदनशील भूमि प्रबंधन अपनाने की सार्वजनिक शपथ ली।

 

समारोह को संबोधित करते हुए COFED के संस्थापक जितेंद्र सेवावत ने इस उपलब्धि को एक प्रशासनिक प्रक्रिया से अधिक जन-आंदोलन बताया। सेवावत ने वर्ष 2014 में टिकाऊ खेती के मॉडल पर काम शुरू किया था, जिसे अंतर-सरकारी संस्था AARDO के 34 सदस्य देशों से मान्यता मिली है। वे जैविक कृषि इनपुट निर्माण और कम लागत वाली जैविक कृषि पद्धतियों के विशेषज्ञ के रूप में भी सूचीबद्ध हैं। उन्होंने “नामीबिया में कम लागत वाली जैविक कृषि पद्धतियों के माध्यम से कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का समाधान” विषय पर एक शोध रिपोर्ट भी लिखी है।

 

सेवावत ने कहा, “यह केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह लोगों का आंदोलन है। जब एक पूरी ग्राम पंचायत जैविक खेती और पशुपालन को अपनाती है, तो वह पूरे देश के लिए मिसाल बन जाती है।” उन्होंने आगे कहा कि बामनवास कांकर यह साबित करता है कि जब समुदाय स्वयं बदलाव की जिम्मेदारी लेते हैं, तो टिकाऊ कृषि संभव हो जाती है। भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए सेवावत ने बताया, “राजस्थान में वर्ष 2026 तक हमारा लक्ष्य बीकानेर, अलवर, कोटपूतली–बहरोड़ और भीलवाड़ा जिलों की 300 ग्राम पंचायतों को पूरी तरह जैविक बनाना है।” इस जैविक बदलाव के लाभ केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं हैं। जैविक पद्धतियां मिट्टी के स्वास्थ्य को सुधारने, नमी धारण क्षमता बढ़ाने और भूजल को रासायनिक प्रदूषण से बचाने में सहायक हैं। किसान पहले ही खेतों में लाभकारी कीटों और सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ने जैसे सकारात्मक बदलाव महसूस कर रहे हैं।

 

आर्थिक रूप से भी जैविक प्रमाणन किसानों के लिए प्रीमियम बाजारों के द्वार खोलता है, जिससे आय में वृद्धि की संभावना बनती है और महंगे रासायनिक इनपुट्स पर निर्भरता घटती है। वहीं पशुपालकों के लिए जैविक पशुपालन बेहतर पशु स्वास्थ्य और सुरक्षित दुग्ध उत्पाद सुनिश्चित करता है, जिससे बाजार में उत्पादों का मूल्य बढ़ सकता है। कई ग्रामीणों के लिए यह बदलाव एक विरासत से भी जुड़ा है। समारोह के दौरान एक किसान ने कहा, “हम यह अपने बच्चों के लिए कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि उन्हें स्वस्थ जमीन और स्वच्छ पानी मिले, न कि ज़हरीली मिट्टी।”

 

जब नीति निर्माता और विकास विशेषज्ञ टिकाऊ कृषि के व्यवहारिक मॉडल तलाश रहे हैं, तब बामनवास कांकर एक जीवंत उदाहरण के रूप में सामने आता है—जो सामुदायिक भागीदारी, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और सामूहिक दृष्टि पर आधारित है। इस गांव की यात्रा यह याद दिलाती है कि वास्तविक बदलाव अक्सर जमीनी स्तर से शुरू होता है, जब साधारण लोग असाधारण रास्ता चुनते हैं।

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