Edited By Anil Jangid, Updated: 05 Jan, 2026 05:03 PM

बीकानेर। हर वर्ष 5 जनवरी को मनाया जाने वाला नेशनल बर्ड डे हमें यह याद दिलाता है कि पक्षी केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं। जल, जंगल, जमीन और आकाश के संतुलन में उनकी भूमिका अत्यंत अहम है। राजस्थान के मरुस्थलीय...
बीकानेर। हर वर्ष 5 जनवरी को मनाया जाने वाला नेशनल बर्ड डे हमें यह याद दिलाता है कि पक्षी केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं। जल, जंगल, जमीन और आकाश के संतुलन में उनकी भूमिका अत्यंत अहम है। राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र में स्थित बीकानेर का जोड़बीड़ इसी संतुलन का जीवंत उदाहरण है, जहाँ हर सर्दी में सूना मरुस्थल जीवन, रंग और चहचहाहट से भर उठता है।
जोड़बीड़ हर वर्ष हजारों प्रवासी पक्षियों का सुरक्षित आश्रय बनता है। साइबेरिया, मंगोलिया, कजाकिस्तान और मध्य एशिया के कड़ाके की ठंड वाले इलाकों से ये पक्षी हजारों किलोमीटर की यात्रा कर यहां पहुंचते हैं। जलस्रोतों की उपलब्धता, खुले मैदान और अपेक्षाकृत शांत वातावरण इस क्षेत्र को उनके लिए आदर्श बनाते हैं। फ्लेमिंगो, क्रेन और विभिन्न जलपक्षियों की मौजूदगी मरुस्थल के बीच एक अद्भुत प्राकृतिक दृश्य रचती है।
यह क्षेत्र केवल जलपक्षियों के लिए ही नहीं, बल्कि शिकारी पक्षियों के लिए भी बेहद अनुकूल है। ईगल, बाज, केस्टरेल जैसे पक्षी यहां नियमित रूप से देखे जाते हैं। ये शिकारी पक्षी छोटे जीवों और कृंतकों की संख्या नियंत्रित कर पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखते हैं और कृषि के लिए भी अप्रत्यक्ष रूप से लाभकारी होते हैं।
जोड़बीड़ को देश के महत्वपूर्ण वल्चर हैबिटैट्स में गिना जाता है। यहां लॉन्ग-बिल्ड वल्चर, व्हाइट-रम्प्ड वल्चर और इजिप्शियन वल्चर जैसी दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। इसके अलावा सर्दियों में स्टेपी ईगल, इम्पीरियल ईगल और गोल्डन ईगल जैसे शक्तिशाली प्रवासी शिकारी पक्षी भी यहां पहुंचते हैं। ये गिद्ध मृत पशुओं को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं और संक्रामक रोगों के फैलाव को रोकते हैं।
हालांकि जोड़बीड़ के सामने चुनौतियां भी हैं। बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप, कचरा और प्लास्टिक प्रदूषण, आवारा कुत्ते पक्षियों के लिए खतरा बन रहे हैं। यदि समय रहते इन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो यह महत्वपूर्ण पक्षी स्थल प्रभावित हो सकता है।
नेशनल बर्ड डे हमें यह संदेश देता है कि संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। जोड़बीड़ यह सिखाता है कि मरुस्थल में भी जीवन की उड़ान संभव है, बस जरूरत है संवेदनशीलता और संरक्षण के संकल्प की।