Edited By Anil Jangid, Updated: 31 Dec, 2025 07:01 PM

बीकानेर। लूणकरणसर क्षेत्र का वेटलैंड इन दिनों प्रकृति के अद्भुत दृश्य का साक्षी बन रहा है। यहां 20 हजार से अधिक प्रवासी पक्षियों—स्थानीय भाषा में कुरजां—ने अपना अस्थायी बसेरा बना लिया है। श्रीगंगानगर हाइवे के समीप स्थित इस वेटलैंड क्षेत्र में सुबह...
बीकानेर। लूणकरणसर क्षेत्र का वेटलैंड इन दिनों प्रकृति के अद्भुत दृश्य का साक्षी बन रहा है। यहां 20 हजार से अधिक प्रवासी पक्षियों—स्थानीय भाषा में कुरजां—ने अपना अस्थायी बसेरा बना लिया है। श्रीगंगानगर हाइवे के समीप स्थित इस वेटलैंड क्षेत्र में सुबह और शाम के समय दूर-दूर तक इन पक्षियों की उड़ान और कलरव सहज ही देखा और सुना जा सकता है।
प्रवासी पक्षी डेमोइसेल्ले क्रेन (Demoiselle Crane) मंगोलिया, कजाकिस्तान और साइबेरिया जैसे अति शीत क्षेत्रों से अगस्त–सितंबर में उड़ान भरते हैं। हजारों मील की लंबी यात्रा तय कर ये पक्षी अक्टूबर के अंत तक राजस्थान पहुंचते हैं और मार्च तक यहां प्रवास करते हैं। वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञों के अनुसार इन देशों में सर्दियों के दौरान तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जिससे जीवन कठिन हो जाता है। इसी कारण कुरजां राजस्थान के अपेक्षाकृत अनुकूल वातावरण में पांच से छह माह बिताते हैं।
कुरजां पिछले करीब 40 वर्षों से बीकानेर क्षेत्र में नियमित रूप से आते रहे हैं। लूणकरणसर के इस क्षेत्र में खारे पानी की झील होने के कारण यह क्षेत्र कुरजां के लिए विशेष रूप से अनुकूल माना जाता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार खारे जल में पनपने वाले सूक्ष्म जलीय जीव, शैवाल और कीट कुरजां के प्राकृतिक आहार का अहम हिस्सा होते हैं और सेलेनाइट अयस्क विशेष रूप से कुरजां को भाता है। इसके साथ ही खारे पानी की झीलों में मानव गतिविधियां अपेक्षाकृत कम होती हैं, जिससे पक्षियों को सुरक्षित और शांत वातावरण मिलता है। ऐसे जलाशयों के किनारे खुले मैदान, उथला जल और पर्याप्त भोजन उपलब्ध होने के कारण कुरजां लंबे समय तक बिना बाधा के प्रवास कर पाते हैं। यही वजह है कि लूणकरणसर की यह खारी झील हर वर्ष हजारों कुरजां को अपनी ओर आकर्षित करती है और उन्हें प्राकृतिक विश्राम स्थल प्रदान करती है।
इस मौसम में कुरजां बीकानेर और जोधपुर संभाग के तालाबों और जलाशयों के किनारे बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं। चूरू का ताल छापर अभयारण्य और भरतपुर का केवलादेव घना पक्षी विहार इनके पसंदीदा ठिकानों में शामिल हैं। वहीं जोधपुर जिले के फलोदी और खिंचन क्षेत्र भी कुरजां की उपस्थिति के लिए प्रसिद्ध हैं।
लूणकरणसर वेटलैंड को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2024 में इस क्षेत्र को वेटलैंड घोषित किए जाने के बाद इसका पर्यावरणीय और पर्यटन महत्व और अधिक बढ़ गया है। वर्तमान में यहां विभिन्न राज्यों और देशों से आने वाले अलग-अलग प्रजातियों के प्रवासी पक्षी भी डेरा जमाने लगे हैं। कई दुर्लभ पक्षी ऐसे हैं, जो अन्य स्थानों पर कम ही देखने को मिलते हैं।
प्रशासन द्वारा इस वेटलैंड को रामसर साइट का दर्जा दिलाने के प्रयास भी अब गति पकड़ते नजर आ रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान और संरक्षण सुनिश्चित हो सकेगा। राजस्थान के जनजीवन और लोकसंस्कृति में कुरजां केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि भावनाओं का संवाहक माना जाता है। दूर देश कमाने गए पति के लिए विरहिणी पत्नी के संदेश को कुरजां के माध्यम से पहुंचाने की परंपरा लोककाव्य में दिखाई देती है—
“कुरजां थे आकाश में, कित जावो की काम,
इण घर रो संदेसड़ों, पहुंचावण उण धाम।”
लोकप्रिय लोकगीत “कुरजां ए म्हारो भंवर मिला देनी ए…” में भी कुरजां को बहन मानकर मन का संदेश प्रियतम तक पहुंचाने का भावनात्मक आग्रह किया गया है। कुरजां वी (V) आकार में समूह बनाकर उड़ान भरते हैं और लगभग 26 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ने की क्षमता रखते हैं। इनकी यह सामूहिक उड़ान न केवल ऊर्जा संरक्षण का उदाहरण है, बल्कि प्रकृति की अद्भुत रणनीति को भी दर्शाती है।