Edited By Kuldeep Kundara, Updated: 08 Aug, 2026 06:24 PM
जयपुर। अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और उसमें खनन गतिविधियों को लेकर जयपुर में प्रेसवार्ता का आयोजन किया गया। जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने अरावली के संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि अरावली पर्वतमाला हमें जिस स्वरूप में मिली है, उसे उसी स्वरूप में अगली पीढ़ी...
जयपुर। अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और उसमें खनन गतिविधियों को लेकर जयपुर में प्रेसवार्ता का आयोजन किया गया। जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने अरावली के संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि अरावली पर्वतमाला हमें जिस स्वरूप में मिली है, उसे उसी स्वरूप में अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, जैव विविधता और करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ी प्राकृतिक विरासत है।
राजेंद्र सिंह ने कहा कि 20 नवंबर 2025 से पहले भी उच्चतम न्यायालय का प्रयास अरावली के संरक्षण की दिशा में रहा है और न्यायपालिका ने समय-समय पर पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। उन्होंने कहा कि अरावली को लेकर किसी भी तरह की ऐसी परिभाषा नहीं बनाई जानी चाहिए, जिससे इसके वास्तविक स्वरूप और विस्तार को नुकसान पहुंचे।
भू-विज्ञान एवं खनिज विशेषज्ञ तथा पूर्व कुलपति प्रोफेसर के.एल. श्रीवास्तव ने कहा कि अरावली पर्वतमाला का विस्तार केवल जमीन के ऊपर दिखाई देने वाले हिस्से तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भूतल के नीचे भी अपना विस्तार बनाए हुए है। ऐसे में केवल 100 मीटर ऊंचाई के आधार पर अरावली की परिभाषा तय करना अर्थहीन है।
उन्होंने कहा कि अरावली भूजल संरक्षण और संवर्धन का प्रमुख आधार है। सतही जल, नदियों के निर्माण और उनके प्रभाव में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ते रेगिस्तान के प्रभाव से राजस्थान को बचाने में अरावली की अहम भूमिका है। इसके साथ ही यह जैव विविधता और पूरे पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण का आधार है।
प्रोफेसर श्रीवास्तव ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के दौर में अरावली का महत्व और बढ़ जाता है। इसके जंगल स्थानीय और मूल निवासियों के जीवन तथा आजीविका से जुड़े हुए हैं। अरावली में लगातार खुदाई और प्राकृतिक संरचना का विनाश पर्यावरणीय संकट को और बढ़ा सकता है। उन्होंने कहा कि करीब 2,000 से 2,500 मिलियन वर्ष पुरानी अरावली भारत की महत्वपूर्ण प्राकृतिक विरासत है और इसके संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए।
वहीं राजस्थान के पूर्व एडवोकेट जनरल एवं अधिवक्ता गिरधारी सिंह बाफना ने कहा कि अरावली में खनन नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अरावली देश की प्राचीनतम प्राकृतिक विरासतों में से एक है और इसे बचाना सरकार का दायित्व है। अरावली जीवन, विरासत और जीविका का आधार है, इसलिए इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए विशेष पर्यावरण संरक्षण कानून बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि इस संबंध में एक विशेष कानून का प्रारूप भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय को तरुण भारत संघ की ओर से भेजा जा चुका है। कानून के प्रारूप को अंतिम रूप देने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के साथ सात सम्मेलन भी आयोजित किए गए हैं। इसके बाद अंतिम प्रारूप तैयार कर वर्तमान समिति, संरक्षण में रुचि रखने वाले जनप्रतिनिधियों और सांसदों को व्यक्तिगत रूप से सौंपा गया है।
प्रेस वार्ता के दौरान पत्रकारों ने अरावली संरक्षण को लेकर आगे की रणनीति और आंदोलन से जुड़े सवाल भी पूछे। इसके जवाब में राजेंद्र सिंह ने कहा कि यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति अरावली के संरक्षण के लिए केवल परिभाषा तक सीमित रहने के बजाय प्रभावी अरावली पुनर्वास योजना तैयार नहीं करती है, तो अरावली क्षेत्र के लोग नवंबर-दिसंबर 2025 में हुए आंदोलन की तर्ज पर फिर आंदोलन कर सकते हैं।
राजेंद्र सिंह ने कहा कि अरावली को उसी रूप में अगली पीढ़ी को सौंपना होगा, जिस रूप में यह हमें मिली है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण आज के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जरूरी है।
उन्होंने आरोप लगाया कि 20 नवंबर 2025 को अरावली में खनन गतिविधियों को खोलने की दिशा में परिभाषा का खेल किया गया। इसके विरोध में अरावली क्षेत्र के लोगों और देशभर के लोगों ने अहिंसक सत्याग्रह के माध्यम से अपनी बात रखी। इसके बाद भारत सरकार और उच्चतम न्यायालय ने अरावली संरक्षण की आवश्यकता को समझते हुए स्वतः संज्ञान लिया और खनन गतिविधियों पर रोक लगाते हुए उच्च स्तरीय समिति का गठन किया।
राजेंद्र सिंह ने समिति की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पहले उच्च अधिकारियों की अध्यक्षता में समिति गठित थी और अब उच्च अधिकारियों वाली समिति बनाई गई है। दोनों समितियां एक ही विभाग से संबंधित हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समिति जयपुर में है, लेकिन अभी तक उसने अपने काम की प्रक्रिया सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं की है। इसको लेकर कई शंकाएं हैं और इन शंकाओं को उच्चतम न्यायालय के समक्ष भी रखा गया है।
उन्होंने कहा कि समिति के लिए यह समझना जरूरी है कि अरावली में खनन की अनुमति देने से इसके जीवन, वन्यजीवन, पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर क्या असर पड़ेगा। साथ ही इस आकलन की प्रक्रिया भी पारदर्शी होनी चाहिए। उन्होंने मांग की कि अरावली को बचाने के लिए पिछले 40 वर्षों से संघर्ष कर रहे लोगों से समिति को मिलना चाहिए और उनकी बात सम्मानपूर्वक सुनी जानी चाहिए।
राजेंद्र सिंह ने दोहराया कि अरावली में खनन बिल्कुल नहीं खुलना चाहिए। उन्होंने कहा कि अरावली का खनन केवल पहाड़ों को नुकसान पहुंचाने का विषय नहीं है, बल्कि यह भारत की प्रकृति और प्राचीन संस्कृति को प्रभावित करने वाला कदम होगा। उन्होंने कहा कि जो देश अपनी अरावली जैसी प्राकृतिक विरासत को बचाने का प्रयास नहीं करेगा, उसे दुनिया पर्यावरण विरोधी देश के रूप में देख सकती है।
उन्होंने न्यायमूर्ति एम.एन. वैंकटचलैया के अरावली और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके निर्णयों से सीख लेकर आगे बढ़ा जाए तो अरावली में खनन को रोकना और इसके संरक्षण को सुनिश्चित करना संभव है।