दहकते अंगारों से पत्थरमार तक: डूंगरपुर में होली की हैरान कर देने वाली परंपराएं

Edited By Afjal Khan, Updated: 27 Feb, 2026 01:05 PM

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होली का त्योहार जहां देशभर में रंग-गुलाल और उल्लास के साथ मनाया जाता है, वहीं राजस्थान के आदिवासी बहुल जिले डूंगरपुर में यह पर्व अनोखी और रोमांचकारी परंपराओं के लिए जाना जाता है। वागड़ क्षेत्र में होली का रंग एक-दो दिन नहीं, बल्कि लगभग एक महीने तक...

होली का त्योहार जहां देशभर में रंग-गुलाल और उल्लास के साथ मनाया जाता है, वहीं राजस्थान के आदिवासी बहुल जिले डूंगरपुर में यह पर्व अनोखी और रोमांचकारी परंपराओं के लिए जाना जाता है। वागड़ क्षेत्र में होली का रंग एक-दो दिन नहीं, बल्कि लगभग एक महीने तक छाया रहता है। इस दौरान सदियों पुरानी परंपराएं आज भी पूरी आस्था और जोश के साथ निभाई जाती हैं।

कोकापुर में दहकते अंगारों पर चलने की परंपरा

डूंगरपुर जिले के कोकापुर गांव में होली के अवसर पर एक अनूठी परंपरा निभाई जाती है। होलिका दहन के अगले दिन तड़के ग्रामीण जलती होली के दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं।

ग्रामीणों की मान्यता है कि ऐसा करने से गांव पर आने वाली विपत्तियां टल जाती हैं और सालभर सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस आयोजन को देखने के लिए आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है और अब तक किसी बड़ी अनहोनी की सूचना नहीं है।

भीलूडा की ‘खूनी होली’ — पत्थरों की राड़

जहां देश में होली रंगों से खेली जाती है, वहीं डूंगरपुर के भीलूडा गांव में धुलंडी के दिन ‘पत्थरमार होली’ की परंपरा आज भी जीवित है। करीब दो सौ साल पुरानी इस परंपरा में रंगों की जगह पत्थरों का इस्तेमाल होता है।

स्थानीय रघुनाथ मंदिर परिसर में आसपास के गांवों से आए सैकड़ों लोग दो दलों में बंट जाते हैं। हाथों में पत्थर, गोफन और ढाल लिए प्रतिभागी एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। इस आयोजन को स्थानीय भाषा में ‘पत्थरों की राड़’ कहा जाता है।

चोट लगना और खून निकलना यहां अपशकुन नहीं, बल्कि आने वाले वर्ष के लिए शुभ संकेत माना जाता है। आयोजन के दौरान किसी भी गंभीर स्थिति से निपटने के लिए चिकित्सा दल और एंबुलेंस भी तैनात रहती है।

देवल और जेठाना में गेर की परंपरा

डूंगरपुर के देवल और जेठाना गांवों में होली पर ‘गेर’ खेलने की परंपरा भी खास पहचान रखती है। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वेशभूषा के साथ ग्रामीण जुलूस निकालते हैं और सामूहिक उत्सव का आनंद लेते हैं। यह परंपरा होली को सांस्कृतिक रंग भी देती है।

आस्था, रोमांच और परंपरा का संगम

भारत में त्योहारों को विविध परंपराओं के साथ मनाने की परंपरा सदियों पुरानी है। होली जैसे उल्लासपूर्ण पर्व में डूंगरपुर की ये अनूठी रस्में इसे और भी विशिष्ट बना देती हैं।

वागड़ क्षेत्र की ये परंपराएं एक ओर जहां लोकआस्था को दर्शाती हैं, वहीं दूसरी ओर सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने का उदाहरण भी पेश करती हैं।

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