प्रतापगढ़ में लहलहाया ‘काला सोना’, 9 हजार से अधिक किसानों की रातों की नींद उड़ी

Edited By Anil Jangid, Updated: 14 Jan, 2026 04:44 PM

black gold thrives in pratapgarh fields

प्रतापगढ़। राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले की पहचान और अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली अफीम की फसल—जिसे स्थानीय किसान ‘काला सोना’ कहते हैं—इन दिनों खेतों में पूरी तरह लहलहा रही है। जिले के 273 गांवों में चारों ओर अफीम की हरियाली नजर आ रही है, लेकिन...

प्रतापगढ़। राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले की पहचान और अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली अफीम की फसल—जिसे स्थानीय किसान ‘काला सोना’ कहते हैं—इन दिनों खेतों में पूरी तरह लहलहा रही है। जिले के 273 गांवों में चारों ओर अफीम की हरियाली नजर आ रही है, लेकिन इस हरियाली के पीछे किसानों की चिंता भी उतनी ही गहरी है। बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और सुरक्षा के खतरे अफीम उत्पादक किसानों की रातों की नींद उड़ा रहे हैं।

 

अफीम खेती का बढ़ता दायरा
जिला अफीम अधिकारी एच.एल. वर्मा के अनुसार, वर्ष 2025-26 में प्रतापगढ़ जिले में अफीम की खेती का रकबा बढ़ा है। इस सीजन में कुल 9,641 किसानों को अफीम उत्पादन के लाइसेंस जारी किए गए हैं, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 8,038 थी। प्रतापगढ़ और छोटीसादड़ी खंड में कुल 851.600 हेक्टेयर क्षेत्र में अफीम की बुवाई की गई है। इनमें से 2,390 किसान सीपीएस (Opium Poppy Straw) पद्धति के तहत खेती कर रहे हैं। फसल की निगरानी और माप-जोख के लिए विभाग की 18 टीमें लगातार खेतों का दौरा कर रही हैं।

 

मौसम बना सबसे बड़ी चुनौती
फसल भले ही हरी-भरी दिख रही हो, लेकिन किसान विष्णुलाल और पन्नालाल लबाना बताते हैं कि इस बार मौसम ने सबसे ज्यादा परेशान किया है। सुबह के समय घनी धुंध और अत्यधिक ओस के कारण अफीम के नाजुक पौधों में पीलापन आने लगा है। नमी बढ़ने से फसल में रोग लगने का खतरा भी बढ़ गया है। फसल को सुरक्षित रखने के लिए किसानों को हर 8 से 10 दिन में कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ रहा है। एक बार के स्प्रे पर 4 से 5 हजार रुपये तक खर्च हो रहा है, जिससे खेती की लागत उम्मीद से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

 

खेतों की रखवाली बनी बड़ी चुनौती
अफीम की खेती जितनी लाभकारी है, उतनी ही जोखिम भरी भी है। इस समय किसानों के सामने तीन बड़ी सुरक्षा चुनौतियां हैं—

 

नीलगायों का आतंक
जाली लगाने के बावजूद नीलगाय खेतों में घुसकर फसल को नुकसान पहुंचा रही हैं।

 

तोतों का हमला
जैसे-जैसे पौधों पर डोडे (कैप्सूल) बनते हैं, तोतों का हमला तेज हो जाता है। डोडे को कुतरकर वे अफीम नष्ट कर देते हैं, जिससे बचाव के लिए पूरे खेत को नेट से ढकना पड़ता है।

 

चोरी का डर
डोडों से अफीम निकालने के समय चोरी की घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में किसानों को कड़ाके की ठंड में भी रात भर खेतों में जागकर पहरा देना पड़ रहा है।

 

लाभ के साथ जोखिम भी
प्रतापगढ़ में अफीम की खेती किसानों के लिए आय का बड़ा साधन है, लेकिन बढ़ती लागत, मौसम की मार और सुरक्षा की चिंता ने इस ‘काले सोने’ को संभालना कठिन बना दिया है। किसान अपनी मेहनत के साथ-साथ अपनी जमा-पूंजी और रातों की नींद भी दांव पर लगाकर इस फसल को बचाने में जुटे हुए हैं।

Trending Topics

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!