Edited By Anil Jangid, Updated: 21 Jan, 2026 04:48 PM

जयपुर। राजस्थान में आगामी पंचायत चुनावों से पहले भजनलाल शर्मा सरकार ने एक बड़ा और रणनीतिक दांव खेला है। राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक में लिए गए फैसले के तहत 23 जनवरी से पूरे प्रदेश में ग्राम उत्थान शिविरों का आयोजन किया जाएगा। भले ही यह निर्णय...
जयपुर। राजस्थान में आगामी पंचायत चुनावों से पहले भजनलाल शर्मा सरकार ने एक बड़ा और रणनीतिक दांव खेला है। राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक में लिए गए फैसले के तहत 23 जनवरी से पूरे प्रदेश में ग्राम उत्थान शिविरों का आयोजन किया जाएगा। भले ही यह निर्णय प्रशासनिक और विकासात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने भी गहरे माने जा रहे हैं। माना जा रहा है कि इन शिविरों का सीधा असर पंचायत चुनावों पर देखने को मिलेगा।
राजस्थान में पंचायत चुनावों को अक्सर मध्यवर्ती चुनावों की तरह देखा जाता है, क्योंकि ये चुनाव ग्रामीण जनता के मन की वास्तविक तस्वीर सामने लाते हैं। उपचुनावों की तुलना में पंचायत चुनावों का दायरा व्यापक होता है और इससे सरकार के प्रति जनभावना का सही आकलन हो जाता है। ऐसे में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक का यह फैसला भाजपा की मजबूत चुनावी तैयारी की ओर इशारा करता है।
ग्राम उत्थान शिविरों के माध्यम से सरकार की योजना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में विकास योजनाओं के लाभार्थियों तक सीधी पहुंच बनाई जाए। शिविरों में न केवल सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा, बल्कि आमजन की शिकायतों, अभावों और आपत्तियों पर भी मौके पर ही सुनवाई की जाएगी। सरकार का उद्देश्य साफ है—जनता के बीच असंतोष, गिले-शिकवे और नाराजगी को चुनाव से पहले ही दूर कर दिया जाए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन शिविरों के जरिए सरकार ग्रामीण मतदाताओं को यह संदेश देना चाहती है कि भाजपा सरकार उनके सुख-दुख में सीधे तौर पर उनके साथ खड़ी है। इससे पंचायत चुनावों में पार्टी को लाभ मिलने की पूरी संभावना है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब किसी सरकार ने ऐसा कदम उठाया हो। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के दौरान भी “प्रशासन गांवों के संग” जैसे अभियानों के जरिए ग्रामीण वोटरों को साधने की कोशिश की जाती रही है।
फिलहाल, इस बार ग्राम उत्थान शिविरों को लेकर सरकार और संगठन दोनों स्तरों पर ज्यादा गंभीरता दिखाई दे रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी के नेता और कार्यकर्ता इस अभियान से कितनी सक्रियता से जुड़ते हैं और जमीन पर इसका कितना असर दिखाई देता है। बहरहाल, खाका तैयार है और अब सबकी निगाहें 23 जनवरी से शुरू होने वाले शिविरों पर टिकी हैं।