Edited By Vishal Suryakant, Updated: 18 Sep, 2026 06:56 PM
Rajasthan Nikay Chunav 2026: राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद अब बोर्ड गठन को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हैं। प्रदेश के कई निकायों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में निर्दलीय और अन्य दलों से जीतकर आए पार्षदों की...
Rajasthan Nikay Chunav 2026: राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद अब बोर्ड गठन को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हैं। प्रदेश के कई निकायों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में निर्दलीय और अन्य दलों से जीतकर आए पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। कई जगहों पर पार्षदों की बाड़ेबंदी की खबरों के बीच होटल और रिसॉर्ट में राजनीतिक बैठकों का दौर चल रहा है।
309 निकायों में 145 जगह बहुमत का अभाव
राजस्थान में इस बार 309 नगरीय निकायों में चुनाव हुए। इनमें 10 नगर निगम, 47 नगर परिषद और 252 नगर पालिकाएं शामिल हैं। चुनाव परिणामों के बाद करीब 145 निकाय ऐसे हैं, जहां किसी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है।
इनमें 5 नगर निगम, 18 नगर परिषद और 122 नगर पालिकाएं शामिल हैं। ऐसे में इन निकायों में बोर्ड गठन के लिए राजनीतिक दलों को निर्दलीय या अन्य दलों से जीतकर आए पार्षदों का समर्थन जुटाना पड़ सकता है।
2000 से ज्यादा निर्दलीय-अन्य पार्षदों की अहम भूमिका
राजस्थान के 10 हजार से ज्यादा वार्डों में हुए चुनाव में 2,273 वार्डों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। इसके अलावा अन्य छोटे दलों के उम्मीदवार भी कई वार्डों में जीतकर आए हैं।
यही वजह है कि बोर्ड गठन से पहले निर्दलीय पार्षदों की राजनीतिक अहमियत बढ़ गई है। जहां किसी दल के पास बहुमत से कुछ सीटें कम हैं, वहां निर्दलीय पार्षद बोर्ड बनाने के समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं।
जोधपुर से अजमेर तक बहुमत का गणित
जोधपुर, भरतपुर, अजमेर, पाली और अलवर जैसे प्रमुख निकायों में बीजेपी सबसे बड़े दल के तौर पर सामने आई है, लेकिन कई जगह बहुमत का आंकड़ा हासिल नहीं हुआ है।
ऐसे में बोर्ड गठन के लिए निर्दलीय पार्षदों का समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी कारण अलग-अलग राजनीतिक दल अपने पार्षदों के साथ-साथ निर्दलीय पार्षदों से भी संपर्क साध रहे हैं।
निकाय अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव से पहले पार्षदों को एकजुट रखने के लिए कई जगह बाड़ेबंदी की तस्वीरें और वीडियो भी सामने आए हैं।
कुछ नगर पालिकाओं में निर्दलीयों का अपना बहुमत
प्रदेश की कई छोटी नगर पालिकाओं में स्थिति और भी अलग है। यहां निर्दलीय उम्मीदवारों ने बड़ी संख्या में जीत हासिल की है और कुछ निकायों में निर्दलीयों का समूह खुद बोर्ड गठन की स्थिति में पहुंच गया है।
मकराना, नदबई, डीग और भुसावर जैसे निकायों के परिणामों में भी निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका चर्चा में रही है।
इससे यह साफ है कि निकाय चुनाव में स्थानीय स्तर के मुद्दे, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों ने भी चुनावी नतीजों को प्रभावित किया है।
टिकट का समीकरण बिगड़ा तो निर्दलीयों ने मारी बाजी
नगरीय निकाय चुनाव में कई जगह राजनीतिक दलों के टिकट वितरण को लेकर असंतोष भी देखने को मिला। टिकट नहीं मिलने के बाद कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरकर जीत हासिल की।
स्थानीय मुद्दे, व्यक्तिगत जनाधार और उम्मीदवार की स्थानीय पकड़ के कारण कई वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को चुनौती दी।
इसी वजह से अब चुनाव परिणाम के बाद निर्दलीय पार्षदों को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ी हुई है।
जयपुर में मोहम्मद रईस खान का मामला भी चर्चा में
जयपुर में निर्दलीय पार्षद मोहम्मद रईस खान का मामला भी चुनाव बाद की राजनीतिक हलचल के बीच चर्चा में रहा। एक दिन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ से मुलाकात के दौरान उनके गले में बीजेपी का पटका नजर आया, जबकि अगले दिन सोशल मीडिया पर उनकी ओर से कांग्रेस से जुड़े होने के दावे किए गए।
यह मामला बताता है कि निकाय चुनाव के बाद स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण कितनी तेजी से बदल सकते हैं। हालांकि किसी पार्षद की अंतिम राजनीतिक स्थिति उसके आधिकारिक बयान और संबंधित दल के रिकॉर्ड से ही स्पष्ट मानी जाएगी।
21-22 सितंबर को अध्यक्ष-उपाध्यक्ष चुनाव
अब सभी की नजर 21 और 22 सितंबर को होने वाले नगर निकाय अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव पर है।
बहुमत से दूर खड़े राजनीतिक दलों के लिए निर्दलीय और अन्य दलों के पार्षदों का समर्थन अहम हो सकता है। यही कारण है कि चुनाव परिणाम आने के बाद से ही पार्षदों के संपर्क, बैठकों और बाड़ेबंदी का दौर तेज हुआ है।
अब देखना होगा कि अंतिम समय तक कितने पार्षद किस खेमे के साथ जाते हैं और किन निकायों में किस दल का बोर्ड बनता है।
आखिरी वक्त तक बदल सकता है समीकरण
निकाय चुनाव का मतदान और मतगणना पूरी हो चुकी है, लेकिन बोर्ड गठन की प्रक्रिया के कारण स्थानीय राजनीति में हलचल अभी जारी है।
जहां किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत है, वहां बोर्ड गठन का रास्ता अपेक्षाकृत सीधा है। लेकिन त्रिशंकु निकायों में निर्दलीय और अन्य दलों के पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
ऐसे में राजस्थान की नगरीय राजनीति में अब सबसे बड़ा सवाल यही है—किसके पास कितने पार्षद हैं और आखिरी वक्त में कौन किसके साथ जाता है?
21-22 सितंबर को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव के साथ ही इन सियासी समीकरणों की तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाएगी।