Edited By Sourabh Dubey, Updated: 12 Oct, 2026 05:33 PM
दिल्ली में अशोक गहलोत, सचिन पायलट और गोविंद सिंह डोटासरा समेत राजस्थान कांग्रेस के नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठाई। जानें SIR के आंकड़ों और चुनावी पारदर्शिता पर चुनाव आयोग का पक्ष।
नई दिल्ली/जयपुर: चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर INDIA गठबंधन के आह्वान पर दिल्ली में विरोध मार्च निकाला गया। इसमें राजस्थान कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भाग लेकर चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठाई। वहीं, चुनाव आयोग की ओर से सामने रखे गए पक्ष में मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया और मसौदा सूची के आंकड़ों को अंतिम आंकड़ों से अलग समझने पर जोर दिया गया है।
दिल्ली में राजस्थान कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने किया प्रदर्शन
दिल्ली में आयोजित विरोध मार्च में राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली सहित कांग्रेस के कई नेता शामिल हुए। राजस्थान से कांग्रेस के सांसद और विधायक भी इस प्रदर्शन में पहुंचे।
प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेताओं ने केंद्र सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग का आरोप लगाया। नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। इसी मांग को लेकर उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठाई।
राजस्थान कांग्रेस के नेताओं ने संकेत दिया कि चुनावी पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों पर उनकी लड़ाई आगे भी जारी रहेगी। हालांकि, केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोप कांग्रेस के राजनीतिक दावे हैं, जिनका स्वतंत्र तथ्यों के आधार पर मूल्यांकन किया जाना जरूरी है।
चुनाव आयोग ने SIR के आंकड़ों को लेकर क्या कहा?
दूसरी ओर, चुनाव आयोग से संबंधित प्रतिक्रिया में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान सामने आने वाले आंकड़ों को उनके सही संदर्भ में समझने पर जोर दिया गया है। आयोग के पक्ष के अनुसार, मसौदा चरण में दर्ज प्रविष्टियों और अंतिम मतदाता सूची से हटाए गए नामों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
बहस में लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने का दावा चर्चा में रहा है। उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, मसौदा चरण की प्रविष्टियों में लगभग 2.8 करोड़ मृतक, 3 करोड़ अनुपस्थित या लापता, 6.3 करोड़ स्थायी रूप से स्थानांतरित और 1 करोड़ एक से अधिक स्थानों पर दर्ज नामों की श्रेणियां शामिल बताई गई हैं।
इन आंकड़ों को अंतिम रूप से हटाए गए नामों की संख्या मानना उचित नहीं होगा। मतदाता सूची को अंतिम रूप देने से पहले सत्यापन, दावों और आपत्तियों तथा आवश्यक सुधार की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। इन श्रेणियों के वास्तविक प्रशासनिक परिणामों को समझने के लिए संबंधित राज्य, पुनरीक्षण चरण और अंतिम प्रकाशित सूची के आधिकारिक आंकड़ों का मिलान जरूरी है।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर क्यों है जोर?
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का सवाल केवल मतदान के दिन की व्यवस्थाओं तक सीमित नहीं है। मतदाता सूची तैयार करने, नाम जोड़ने, गलत प्रविष्टियों में सुधार करने और पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने से जुड़े निर्णयों की स्पष्ट जानकारी भी महत्वपूर्ण है।
भारत में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन के कार्यकाल को आदर्श आचार संहिता के कड़े प्रवर्तन और चुनाव आयोग की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने के संदर्भ में याद किया जाता है। वर्तमान दौर में डिजिटल माध्यमों से सूचनाएं तेजी से प्रसारित होती हैं, ऐसे में चुनावी आंकड़ों का स्पष्ट और समय पर संचार संस्थागत विश्वास बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।
मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया से जुड़े दावों का आकलन करते समय मसौदा सूची, अंतिम सूची और दावों-आपत्तियों के बाद हुए बदलावों के बीच अंतर समझना आवश्यक है। इसी तरह, राजनीतिक दलों की मांगों और आरोपों को भी संबंधित तथ्यों तथा आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर परखा जाना चाहिए।
चुनावी निष्पक्षता पर राजनीतिक बहस जारी
दिल्ली में राजस्थान कांग्रेस का विरोध मार्च और SIR के आंकड़ों पर चुनाव आयोग का पक्ष चुनावी पारदर्शिता से जुड़ी बहस के दो महत्वपूर्ण पहलू सामने लाते हैं। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग के जरिए चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, जबकि आयोग से संबंधित प्रतिक्रिया में मतदाता सूची के आंकड़ों को सही संदर्भ में समझने और प्रक्रिया की जानकारी स्पष्ट रखने पर जोर दिया गया है।
अब इस बहस में मतदाता सूची के आधिकारिक आंकड़ों, सत्यापन प्रक्रिया और दावों-आपत्तियों के निस्तारण की जानकारी महत्वपूर्ण रहेगी। चुनावी संस्थाओं पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए पारदर्शी प्रक्रिया, स्पष्ट संचार और तथ्यों के आधार पर जवाबदेही की भूमिका अहम है।