अरावली विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान, 100 मीटर परिभाषा पर अहम सुनवाई!

Edited By Payal Choudhary, Updated: 28 Dec, 2025 05:43 PM

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अरावली पर्वतमाला को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच गया है। जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली मानने की नई परिभाषा पर उठे विरोध को देखते हुए Supreme Court of India ने इस मामले में स्वतः...

अरावली पर्वतमाला को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच गया है। जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली मानने की नई परिभाषा पर उठे विरोध को देखते हुए Supreme Court of India ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया है। सोमवार को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली वैकेशन बेंच इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुनवाई करेगी।

यह मामला सुप्रीम कोर्ट की वैकेशन कोर्ट में सूचीबद्ध किया गया है और इसे लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में पर्यावरण संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों में गहरी चिंता देखी जा रही है। उनका कहना है कि नई परिभाषा के चलते 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों में खनन का रास्ता खुल सकता है, जिससे अरावली की पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंचने की आशंका है।

क्या है पूरा विवाद

दरअसल, 20 नवंबर 2025 को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति की सिफारिश को स्वीकार करते हुए यह कहा गया कि केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली रेंज का हिस्सा माना जाए। इससे पहले गोदावर्मन और एमसी मेहता से जुड़े मामलों में अरावली को व्यापक संरक्षण प्राप्त था और इसकी परिभाषा अपेक्षाकृत विस्तृत मानी जाती थी।

पर्यावरणविदों का तर्क है कि अरावली केवल ऊंचाई का सवाल नहीं है, बल्कि यह एक सतत भूवैज्ञानिक और पारिस्थितिक संरचना है। छोटी पहाड़ियों में खनन की अनुमति मिलने से भूजल स्तर, जैव विविधता और दिल्ली-एनसीआर के पर्यावरण संतुलन पर गहरा असर पड़ सकता है।

केंद्र का पक्ष और खनन पर रोक

विवाद बढ़ने के बाद केंद्र सरकार ने एहतियातन कदम उठाते हुए पूरी अरावली रेंज में नए खनन पट्टों पर रोक लगाने के निर्देश जारी किए हैं। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि अरावली की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी तरह के अनियमित खनन को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

हालांकि, एक दूसरा पक्ष यह भी सामने आ रहा है कि नियंत्रित और वैज्ञानिक तरीके से खनन से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है और विकास परियोजनाओं के लिए जरूरी कच्चा माल उपलब्ध होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी तरह प्रतिबंध के बजाय स्पष्ट नियमों और कड़ी निगरानी के साथ संतुलित मॉडल अपनाया जा सकता है।

आगे क्या?

अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत केंद्र और राज्य सरकारों को नए निर्देश दे सकती है, जिससे यह तय होगा कि अरावली का भविष्य पूर्ण संरक्षण की दिशा में जाएगा या संरक्षण और विकास के संतुलन की ओर।

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