Edited By Anil Jangid, Updated: 25 Apr, 2026 05:01 PM
जयपुर। राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर का 35वां दीक्षांत समारोह आज भव्य एवं गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर शैक्षणिक उत्कृष्टता, परंपरा एवं आधुनिक तकनीकी नवाचारों का समन्वित स्वरूप देखने को मिला।
जयपुर। राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर का 35वां दीक्षांत समारोह आज भव्य एवं गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर शैक्षणिक उत्कृष्टता, परंपरा एवं आधुनिक तकनीकी नवाचारों का समन्वित स्वरूप देखने को मिला।
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन रहे मुख्य अतिथि
समारोह में भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता माननीय राज्यपाल, राजस्थान एवं कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे द्वारा की गई। इस अवसर पर राजस्थान के उपमुख्यमंत्री डॉ. प्रेमचन्द बैरवा एवं राज्यसभा सांसद डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस समारोह के शुभारम्भ के साथ कुलगुरु प्रो. अल्पना कटेजा ने सभी अतिथियों, गणमान्यजनों, प्राध्यापकों, अभिभावकों व विद्यार्थियों का स्वागत किया। उन्होंने अपने स्वागत वक्तव्य में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक उपलब्धियों, अनुसंधान गतिविधियों एवं नवाचारों पर प्रकाश डाला।
दीक्षांत समारोह विद्यार्थियों के जीवन की नई यात्रा का प्रारंभ
भारत के उपराष्ट्रपति महोदय सी.पी. राधाकृष्णन ने अपने उद्बोधन में कहा कि दीक्षांत समारोह केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि का समापन नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के जीवन की नई यात्रा का प्रारंभ है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अर्जित ज्ञान को केवल डिग्री तक सीमित न रखें, बल्कि उसे ईमानदारी, उद्देश्यपूर्णता और उत्कृष्टता के साथ अपने जीवन में उतारें। उन्होंने देश के विकास के संदर्भ में युवाओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि वे रोजगार तलाशने वाले नहीं, बल्कि रोजगार सृजित करने वाले, नवाचारकर्ता और जिम्मेदार नेतृत्वकर्ता बनें।
छात्राओं की उत्कृष्ट उपलब्धियों की सराहना की
उन्होंने विशेष रूप से छात्राओं की उत्कृष्ट उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा कि स्वर्ण पदकों में उनकी बढ़ती भागीदारी समाज में सकारात्मक परिवर्तन और महिला सशक्तिकरण का सशक्त संकेत है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले समय में महिलाओं की भागीदारी देश के नीति-निर्माण और नेतृत्व में और अधिक सुदृढ़ होगी। साथ ही उन्होंने विद्यार्थियों को निरंतर सीखते रहने, प्रश्न पूछने और असफलताओं से सीख लेकर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उपराष्ट्रपति महोदय ने विद्यार्थियों को जीवन में नैतिकता, संवेदनशीलता और विनम्रता को अपनाने का संदेश देते हुए कहा कि वास्तविक सफलता वही है, जिसमें व्यक्तिगत प्रगति के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का समन्वय हो। उन्होंने माता-पिता और शिक्षकों के योगदान को स्मरण करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का आह्वान किया तथा विद्यार्थियों को बड़े लक्ष्य निर्धारित कर समर्पण के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। अंत में उन्होंने सभी स्नातकों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
धर्म का अर्थ कर्तव्य, नैतिकता और सत्य आचरण से
राज्यपाल एवं कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे ने अपने उद्बोधन में विश्वविद्यालय के ध्येय वाक्य “धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा” के माध्यम से भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए कहा कि धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय विशेष से नहीं, बल्कि कर्तव्य, नैतिकता और सत्य आचरण से है। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा ज्ञान, संस्कृति और मूल्यों के समन्वय की रही है, और विश्वविद्यालय इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए समाज को दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
केंद्रीय पुस्तकालय एवं विवेकानंद मेमोरियल की सराहना की
उन्होंने विश्वविद्यालय में स्थापित केंद्रीय पुस्तकालय एवं विवेकानंद मेमोरियल जैसे केंद्रों की सराहना करते हुए कहा कि ये विद्यार्थियों को ज्ञान और आत्मविकास के लिए प्रेरित करते हैं। स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन को जीवन की सफलता का आधार बताया। विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन का मूल्य केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि समाज को दिए गए योगदान से तय होता है। उन्होंने नैतिकता, सेवा भावना और गरिमा बनाए रखने पर जोर दिया। साथ ही, समाज में नकारात्मकता को प्रारंभ में ही समाप्त करने और सकारात्मकता को बढ़ावा देने की अपील की। उन्होंने विद्यार्थियों से अनुशासित, मूल्यवान और आदर्श जीवन जीने का आह्वान किया।
डॉ. प्रेमचन्द बैरवा ने भी दिया संबोधन
डॉ. प्रेमचन्द बैरवा, उपमुख्यमंत्री ने एक प्रेरणादायक संबोधन में युवाओं को शिक्षा, अनुशासन और नैतिक मूल्यों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। उन्होंने डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी साधन है और हर युवा को इसे अपना सर्वोच्च लक्ष्य बनाना चाहिए।
अपने उद्बोधन में उन्होंने सफलता के पाँच मूल मंत्र-धैर्य, अनुशासन, अनुकूलन, ईमानदारी और सार्थकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ निरंतर सीखना और स्वयं को ढालना आवश्यक है, जबकि चरित्र और ईमानदारी से कभी समझौता नहीं करना चाहिए।
युवाओं की शिक्षा का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे
डॉ. बैरवा ने कहा कि युवाओं की शिक्षा तभी सार्थक है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। उन्होंने देश की प्रगति का उल्लेख करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “यही समय है, सही समय है” मंत्र को दोहराया और युवाओं को “विकसित भारत” के संकल्प में सहभागी बनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत का युवा नवाचार, स्टार्टअप और तकनीकी प्रगति के माध्यम से देश को नई ऊँचाइयों तक ले जाएगा।
डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल का प्ररेणादायक संबोधन
राज्यसभा सांसद डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने राजस्थान विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित करते हुए एक प्रेरणादायक संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1947 में स्थापित यह संस्थान शिक्षा, संस्कार और राष्ट्र निर्माण का प्रमुख केंद्र रहा है, जिससे सी. राजगोपालाचारी जैसे महान व्यक्तित्व जुड़े रहे हैं। डॉ. अग्रवाल ने विश्वविद्यालय के अंगीभूत महाविद्यालयों-महाराजा और महारानी कॉलेज के क्रांतिकारी गौरव को याद करते हुए स्वतंत्रता सेनानी अर्जुन लाल जेटली, रामानंद चौधरी और बिहारीलाल अग्रवाल के बलिदानों को नमन किया। उन्होंने कहा कि इन शिक्षण संस्थानों ने न केवल शिक्षा दी, बल्कि आजादी के आंदोलन को भी नई दिशा दी। महाभारत के ’यक्ष-प्रश्न’ प्रसंग का उल्लेख करते हुए सांसद ने जोर दिया कि बिना अनुशासन और नैतिक आचरण के केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य आचरण को श्रेष्ठ बनाना है।
आपका व्यवहार ही आपकी असली पहचान
छात्रों को संबोधित करते हुए डॉ. अग्रवाल ने कहा, “आपका व्यवहार ही आपकी असली पहचान होनी चाहिए।“ उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे विश्वविद्यालय की परंपरा को आगे बढ़ाएं ताकि समाज में उनका आचरण संस्थान की प्रतिष्ठा का प्रतिबिंब बने। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि शिक्षा तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति के स्वभाव और चरित्र में झलकती हो।
कुल 250 स्वर्ण पदक मेधावी विद्यार्थियों का दिए
इस अवसर पर कुल 250 स्वर्ण पदक मेधावी विद्यार्थियों को प्रदान किए गए, जिनमें 197 छात्राएँ एवं 53 छात्र शामिल रहे। इसके अतिरिक्त लगभग 2.71 लाख उपाधियाँ विभिन्न संकायों के विद्यार्थियों को प्रदान की गईं। विश्वविद्यालय की यह भी एक नई अभिनव पहल रही कि दीक्षान्त समारोह की डिग्रीयों का डाटा आज ही ’डिजी लॉकर’ पर अपलोड कर छात्रों हेतु उपलब्ध करवा दिया गया है।
डिग्रियां उन्नत सुरक्षा मानकों एवं आधुनिक तकनीकी विशेषताओं से युक्त
विशेष उल्लेखनीय है कि इस वर्ष प्रदान की गई उपाधियाँ उन्नत सुरक्षा मानकों एवं आधुनिक तकनीकी विशेषताओं से युक्त हैं। प्रत्येक डिग्री को 4-कलर उच्च गुणवत्ता प्रिंटिंग के साथ तैयार किया गया है, जबकि विशेष 243 GSM/350 माइक्रोन सिंथेटिक, माइक्रोपोरस एवं जलरोधी कागज का उपयोग किया गया है, जिससे यह दीर्घकाल तक सुरक्षित एवं टिकाऊ रहती है।
डिग्रियों में QR कोड/ बारकोड आधारित डिजिटल सत्यापन प्रणाली सम्मिलित की गई है, जिससे उपाधियों का त्वरित ऑनलाइन सत्यापन संभव है तथा यह विश्वविद्यालय के डिजिटल डेटाबेस से संबद्ध है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक उपाधि पर यूनिक सीरियल नंबर एवं वेरिएबल डेटा फीचर्स अंकित हैं, जो उसकी विशिष्ट पहचान सुनिश्चित करते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से डिग्रियों में यूवी इनविजिबल इंक, माइक्रो एवं रिवर्स माइक्रो प्रिंटिंग, वॉइड पैंटोग्राफ (फोटोकॉपी पर 'COPY' का उभरना), हिडन एवं ड्यूल हिडन फीचर्स, इनविजिबल लोगो, एंटी-कॉपी तंत्र एवं कोरिलेशन मार्क जैसे उन्नत उपाय शामिल किए गए हैं, जिससे जालसाजी की संभावना अत्यंत न्यूनतम हो जाती है। साथ ही, डिग्रियों में गोल्ड फॉइल प्रिंटिंग, एम्बॉसिंग, हाई-रिजोल्यूशन बॉर्डर, रेनबो कलर, फाइन लाइन रिलीफ एवं थर्मो-क्रोमिक इंक जैसी उन्नत प्रिंटिंग तकनीकों का उपयोग किया गया है, जो इन्हें न केवल आकर्षक बनाती हैं, बल्कि सुरक्षा की अतिरिक्त परत भी प्रदान करती हैं।
अंत में कुलसचिव द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया तथा राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ।
विश्वविद्यालय की नवाचार एवं गुणवत्ता के प्रति प्रतिबद्धता का सशक्त प्रमाण
यह दीक्षांत समारोह न केवल विद्यार्थियों की उपलब्धियों का उत्सव रहा, बल्कि सुरक्षित, पारदर्शी एवं तकनीक-सक्षम डिग्री प्रणाली के माध्यम से विश्वविद्यालय की नवाचार एवं गुणवत्ता के प्रति प्रतिबद्धता का सशक्त प्रमाण भी बना।