राजस्थान हाईवे पर तैयार होगा ईको कॉरिडोर, विकास और नेचर का सामंजस्य

Edited By Anil Jangid, Updated: 21 Feb, 2026 02:53 PM

rajasthan highways to feature eco corridors for pollinators and biodiversity

नागौर। राजस्थान में राष्ट्रीय राजमार्ग अब केवल तेज रफ्तार और कंक्रीट की पहचान नहीं रहेंगे, बल्कि यह जैव विविधता संरक्षण का भी केंद्र बनेंगे। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने राजमार्गों के किनारे मधुमक्खी-अनुकूल हरित पट्टियां विकसित...

नागौर। राजस्थान में राष्ट्रीय राजमार्ग अब केवल तेज रफ्तार और कंक्रीट की पहचान नहीं रहेंगे, बल्कि यह जैव विविधता संरक्षण का भी केंद्र बनेंगे। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने राजमार्गों के किनारे मधुमक्खी-अनुकूल हरित पट्टियां विकसित करने की दिशा में ठोस पहल शुरू की है। यह योजना विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने की एक कोशिश मानी जा रही है।

 

एनएचएआई ने इसे देश में हाईवे पर अपना पहला ‘मधुमक्खी गलियारा’ बताया है। यह परियोजना परागणकर्ता कीटों, विशेषकर मधुमक्खियों की घटती संख्या को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। हाल के वर्षों में कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग, घटते हरित क्षेत्र और बदलती जलवायु के कारण मधुमक्खियों की संख्या तेजी से कम हुई है। इसका प्रभाव कृषि और बागवानी पर भी पड़ा है, क्योंकि फसलों का बड़ा हिस्सा परागण पर निर्भर करता है।

 

योजना के तहत राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे 500 मीटर से एक किलोमीटर के अंतराल पर फूलों और पेड़-पौधों के समूह लगाए जाएंगे। इन हरित पट्टियों में नीम, करंज, महुआ, पलाश, जामुन, सिरिस और बॉटल ब्रश जैसी देशी प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही झाड़ियों, जड़ी-बूटियों और घास का मिश्रण भी होगा, जिससे सालभर पराग और मकरंद उपलब्ध रह सके।

 

परियोजना में प्राकृतिक संरचनाओं का विकास भी शामिल है। लकड़ी और खोखले तनों जैसी संरचनाएं बनाई जाएंगी, जो मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं के लिए आश्रय का काम करेंगी। एनएचएआई के प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय तीन मधुमक्खी गलियारों के लिए हाइवे चयनित करेंगे और उन्हें 2026-27 तक विकसित किया जाएगा।

 

इस पहल का उद्देश्य न केवल हाईवे को हरित और सुंदर बनाना है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता बढ़ाने में भी योगदान देना है। मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं के लिए सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने से कृषि उत्पादकता पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। एनएचएआई की यह योजना यह दिखाती है कि भारत में विकास के साथ नेचर का संरक्षण भी अब प्राथमिकता बन रहा है।

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