जैसलमेर में परेशानियों की बस्ती बने सपनों के घर, लाखों खर्च कर भी ऐसे पिस रहे लोग

Edited By Anil Jangid, Updated: 16 Nov, 2025 03:09 PM

dream homes turned into nightmares in jaisalmer desert naval nagar

राजस्थान के जैसलमेर शहर की दीनदयाल कॉलोनी के पास स्थित डेजर्ट नवल नगर नाम सुनते ही लगता है जैसे कोई विकसित बस्ती होगी, जहाँ हर घर में सुविधा और खुशहाली होगी। लेकिन जब आप यहाँ कदम रखते हैं, तो हकीकत आपको झकझोर देती है।

जैसलमेर। राजस्थान के जैसलमेर शहर की दीनदयाल कॉलोनी के पास स्थित डेजर्ट नवल नगर नाम सुनते ही लगता है जैसे कोई विकसित बस्ती होगी, जहाँ हर घर में सुविधा और खुशहाली होगी। लेकिन जब आप यहाँ कदम रखते हैं, तो हकीकत आपको झकझोर देती है। इस कॉलोनी को बसे बर्षों हो गए लेकिन यह कॉलोनी आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है।

 

सरकार के "हर घर नल" और "विकसित जैसलमेर" जैसे दावे भी यहाँ आते ही दम तोड़ते नज़र आते हैं। यह कॉलोनी प्रभुराम माली नामक व्यक्ति द्वारा काटी गई थी। लोगों ने अपनी उम्रभर की कमाई लगाकर लाखों की कीमत में यहाँ प्लॉट खरीदे, सोचा था कि अब अपना घर होगा, सुकून की ज़िंदगी होगी। लेकिन यहाँ आने के बाद जो मिला, वो था संघर्ष, लाचारी और निराशा। पानी की समस्या यहाँ की सबसे बड़ी त्रासदी है।

 

जलदाय विभाग के नलों में पानी नहीं आता लोग टैंकरों पर निर्भर हैं। गर्मी में हालात और भी भयावह हो जाते हैं। बिजली कनेक्शन तो हैं, लेकिन अगर कभी फॉल्ट हो जाए तो बिजली विभाग हाथ खड़े कर देता है। विद्युत विभाग के अधिकारी ये कहकर टरका देते हैं कि ये प्राइवेट कॉलोनी है, हम कुछ नहीं कर सकते। नतीजा लोग खुद पैसे देकर अपनी लाइनें ठीक करवाने को मजबूर हैं। इसके अलावा सड़क के नाम पर यहाँ सिर्फ कच्ची पगडंडी है।

 

बारिश में कीचड़, धूप में उड़ती धूल यही इस कॉलोनी की पहचान बन चुकी है।चलते वक्त पैरों में पत्थर, कंकर और काँटे लगना अब आम बात है। यहाँ ना कोई पार्क है, ना स्कूल, ना ही स्वास्थ्य केंद्र। बच्चों को खेलने की जगह नहीं, बुजुर्गों को बैठने का ठिकाना नहीं। सिवरेज की व्यवस्था न होने से चारों तरफ गंदगी फैली हुई है। गर्मी के दिनों में बदबू और मच्छरों का आतंक बढ़ जाता है। कॉलोनी की हालत देखकर यह कहना मुश्किल है कि यह उसी जैसलमेर का हिस्सा है, जहाँ लाखों सैलानी हर साल आते हैं।

 

डेवलपमेंट के समय जो डिवाइडर बनाए गए थे, वो अब टूटकर मिट चुके हैं। कॉलोनी की हर गली एक अधूरी उम्मीद का प्रतीक है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कानूनी प्रक्रिया पूरी की, लेकिन फिर भी सरकार और विभाग उनकी सुध नहीं ले रहे। जब इस मामले को लेकर यूआईटी सचिव से बात की, तो उन्होंने बताया कि यह कॉलोनी फिलहाल प्राइवेट जमीन पर बनी हुई है।

 

यूआईटी का कहना है कि जब तक कॉलोनी हैंडओवर नहीं होती, तब तक विभाग कोई विकास कार्य नहीं कर सकता। एक तरफ सरकार ‘हर घर नल’, ‘स्मार्ट कॉलोनी’, और ‘विकास के वादे’ करती है,वहीं दूसरी तरफ डेजर्ट नवल नगर जैसे इलाके हैं, जहाँ लोग आज भी मूलभूत अधिकारों के लिए तरस रहे हैं। यह कहानी सिर्फ एक कॉलोनी की नहीं बल्कि उस आम आदमी की कहानी है जिसने अपनी ज़िंदगी की कमाई लगा दी, लेकिन बदले में मिला सिर्फ अंधेरा, धूल और निराशा।

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