Edited By Anil Jangid, Updated: 01 May, 2026 03:45 PM

पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष ज्येष्ठ मास 2 मई से शुरू होकर 29 जून तक रहेगा। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) 17 मई 2026 से शुरू होकर 15 जून...
जयपुर। सनातन धर्म में ज्येष्ठ मास को अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक उन्नति का विशेष समय माना गया है। यह महीना साधना, दान-पुण्य और धार्मिक कार्यों के लिए बेहद शुभ माना जाता है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष ज्येष्ठ मास 2 मई से शुरू होकर 29 जून तक रहेगा। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) 17 मई 2026 से शुरू होकर 15 जून 2026 तक रहेगा। इस वर्ष ज्येष्ठ माह कुल 59 दिनों (2 मई से 29 जून) का होगा, जिसमें यह अधिक मास (मलमास) मुख्य ज्येष्ठ के बीच में आएगा। इस दौरान विष्णु पूजा, दान और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। ज्येष्ठ हिंदू कैलेंडर का तीसरा महीना होता है और इसका संबंध मंगल ग्रह से माना गया है। मान्यता है कि इस महीने की पूर्णिमा तिथि पर ज्येष्ठा नक्षत्र का विशेष संयोग बनता है, जिसके कारण इसे ज्येष्ठ मास कहा जाता है। शास्त्रों में इस अवधि को विशेष रूप से पुण्य अर्जन और आध्यात्मिक कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी बताया गया है। ऐसे में इस पवित्र मास के महत्व, नियम और इसमें किए जाने वाले तथा वर्जित कार्यों को जानना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
वर्ष 2026 इस दृष्टि से अत्यंत खास रहने वाला है, क्योंकि इस बार ज्येष्ठ मास 2 मई से शुरू होकर 29 जून तक चलेगा और अधिक मास के कारण यह अवधि सामान्य से बढ़कर 59 दिनों की हो जाएगी। ज्योतिष शास्त्र में भी ज्येष्ठ माह को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। इस पवित्र महीने में पूजा-पाठ और दान-धर्म करने से कई प्रकार के ग्रह दोष से मुक्ति प्राप्त हो जाती है। साथ ही इस महीने में निर्जला एकादशी और गंगा दशहरा जैसे महत्वपूर्ण व्रत एवं त्योहार मनाए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि ज्येष्ठ माह में ही हनुमान जी की मुलाकात भगवान श्रीराम से हुई थी, इसलिए इस महीने में मंगलवार का व्रत रखने से साधक को विशेष लाभ मिलता है। साथ ही बजरंगबली की विशेष पूजा अर्चना करने से कई प्रकार के कष्टों का नाश हो जाता है।
हिंदू पंचांग का तीसरा महीना यानी ज्येष्ठ माह में जल संरक्षण और पेड़-पौधों को जल देने से कई कष्टों का नाश होता है, साथ ही पितर प्रसन्न होते हैं। ज्येष्ठ माह में गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी जैसे महत्वपूर्ण व्रत एवं त्यौहार मनाए जाएंगे। साथ ही इस महीने में कुछ महत्वपूर्ण ग्रह राशि परिवर्तन भी करेंगे, जिसका प्रभाव सभी राशियों पर पड़ेगा। शास्त्रों में बताया गया है कि ज्येष्ठ माह में दान-धर्म करने से व्यक्ति को विशेष लाभ मिलता है। साथ ही इस माह में किसी जरूरतमंद और पशु-पक्षियों को पानी पिलाने से विशेष लाभ मिलता है। इस महीने में उत्तर भारत समेत तमाम क्षेत्रों में अधिक गर्मी पड़ती है और इस माह में कई तीज-त्योहार और पर्व आते हैं। इस माह में हर महीने में पड़ने वाली एकादशी प्रदोष, पूर्णिमा, नारद जयंती, शीतलाष्टमी, वट सावित्री व्रत, गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी जैसे प्रमुख व्रत और त्योहार पड़ते हैं।
कब से कब तक है ज्येष्ठ महीना
ज्येष्ठ माह की शुरुआत के लिए कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि का आरंभ 2 मई की रात को 10: 52 मिनट पर हो रहा है। इसी दिन से ज्येष्ठ माह की शुरुआत होगी। इसके बाद 29 जून 2026, दिन रविवार को सुबह 3:06 मिनट पर पूर्णिमा तिथि आरंभ होगी। इस दिन ज्येष्ठ माह का अंत होगा। इस प्रकार यह महीना अधिक माह के साथ 59 दिनों का होगा। ज्येष्ठ माह में अधिकमास 17 मई से शुरू होकर 15 जून 2026 तक रहेगा।
अधिक मास
विक्रम संवत 2083 में ज्येष्ठ महीने में अधिक मास आएगा। यह अधिक मास 17 मई से शुरू होकर 15 जून तक रहेगा। अधिक मास आने की वजह से साल के आगे आने वाले व्रत और त्योहारों की तारीखें 15 से 20 दिन आगे खिसक जाएंगी। इस साल एक नहीं, बल्कि 2 महीने ज्येष्ठ होंगे। पहले 15 दिन सामान्य ज्येष्ठ माह होंगे, इसके बाद 30 दिन अधिक ज्येष्ठ मास के होंगे। अंत के 15 दिन फिर सामान्य ज्येष्ठ मास के होंगे।
अधिक ज्येष्ठ मास
आरंभ: 17 मई 2026
समाप्ति: 15 जून 2026
सामान्य ज्येष्ठ मास
आरंभ: 2 मई 2026
समाप्ति: 29 जून 2026
यानी इस अवधि में दोनों महीने एक-दूसरे के साथ ओवरलैप भी करेंगे।
पूजा करना फलदायी
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, जेठ माह में सूर्य देव, वरुण देव, शनि देव और हनुमान जी की पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है।
न करें ये काम
पंचांग के अनुसार जेठ महीने में दिन में नहीं सोना चाहिए। ऐसा करने वाले व्यक्ति को तमाम तरह के रोग घेरते हैं। ज्येष्ठ के महीने मसालेदार चीज का सेवन नहीं करना चाहिए और दिन में एक बार भोजन करने का प्रयास करना चाहिए। लहसुन, राई के अलावा गर्म चीजों का सेवन करने से बचना चाहिए। क्योंकि इस माह में सबसे अधिक गर्मी होती है। इस माह में बैंगन का सेवन करने से बचना चाहिए। क्योंकि इसका सेवन करने से संतान के लिए शुभ नहीं माना जाता है। जेठ के महीने में कभी किसी प्यासे व्यक्ति को बगैर पानी पिलाए नहीं भेजना चाहिए। हिंदू मान्यता के अनुसार जेठ के महीने में परिवार में बड़े पुत्र या फिर पुत्री का विवाह नहीं करना चाहिए। ज्येष्ठ माह में गर्मी पड़ती है और शरीर में जल स्तर गिरने लगता है। इस माह जल का सही इस्तेमाल करना चाहिए और बेकार में जल का व्यर्थ करने से बचना चाहिए।
ज्येष्ठ मास शुभ
शास्त्रों में ज्येष्ठ मास को सभी मास में शुभ माना गया है। ज्येष्ठ के स्वामी मंगल है और मंगल ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में साहस का प्रतीक माना गया है। सभी नवग्रहों में मंगल को सेनापति का दर्जा प्राप्त है। ज्येष्ठ मास भगवान विष्णु का प्रिय मास है। इस मास में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान विष्णु और उनके चरणों से निकलने वाली मां गंगा और पवनपुत्र हनुमान की पूजा का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है। हिंदू धर्म में ज्येष्ठ मास में पड़ने वाले मंगलवार को बड़ा मंगल या फिर बुढ़वा मंगल के नाम से जाना जाता है। ज्येष्ठ मास में पड़ने वाले चार बड़ा मंगल की पूजा करने पर व्यक्ति को मनचाहा फल प्राप्त होता है।
जल का दान सबसे श्रेष्ठ
ज्येष्ठ मास में सबसे ज्याद गर्मी पड़ती है। इस महीने में जल का दान पुण्यदान माना गया है। इस माह में न सिर्फ आम लोगों को बल्कि पशु-पक्षियों की प्यास बुझाने के लिए जल उपलब्ध कराना चाहिए। इससे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जीवन में आने वाले कष्ट दूर होते हैं। ज्येष्ठ मास में प्याऊ लगाना, नल लगवाना और पोखर, तलाबों का सरंक्षण करना विशेष फलदायी माना गया है।
महत्व
हिंदू धर्म में ज्येष्ठ मास का विशेष महत्व भी बता गया है। माना जाता है कि इसी मास में गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। इसी के कारण इस मास, में गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने के बाद दान करने से व्यक्ति को हर तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही इसी महीने में भगवान राम अपने परम भक्त हनुमान जी से मिले थे। इसके साथ ही ज्येष्ठ महीने में ही भगवान शनिदेव का जन्म भी हुआ था।