बैलगाड़ी में मायरा: राजसमंद में अनोखी पहल, आधुनिक दौर में परंपराओं को जीवित रखने का संदेश

Edited By Anil Jangid, Updated: 22 Apr, 2026 05:51 PM

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राजसमंद: आधुनिकता के इस दौर में, जहां पाश्चात्य संस्कृति ने अपने पैर जमा लिए हैं और पारंपरिक रीति-रिवाज धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं, वहां राजसमंद जिले के धोइंदा उपनगर से एक अनोखी पहल सामने आई है। यहां एक व्यक्ति ने बैलगाड़ी में मायरा भरकर न केवल...

राजसमंद: आधुनिकता के इस दौर में, जहां पाश्चात्य संस्कृति ने अपने पैर जमा लिए हैं और पारंपरिक रीति-रिवाज धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं, वहां राजसमंद जिले के धोइंदा उपनगर से एक अनोखी पहल सामने आई है। यहां एक व्यक्ति ने बैलगाड़ी में मायरा भरकर न केवल परंपराओं को जीवित रखने का एक प्रेरक संदेश दिया, बल्कि यह पहल समाज के लिए आकर्षण का केंद्र भी बन गई है।

धोइंदा निवासी मुकेश कुमावत (पुत्र जयराम कुमावत) ने अपनी धर्म बहन रूक्मणी देवी कुमावत के विवाह के अवसर पर बैलगाड़ी में मायरा भरने का निर्णय लिया। मंगलवार को यह आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों लोग धोइंदा बस स्टैंड पर एकत्र हुए। वहां रंग-बिरंगी फर्रियों, गुब्बारों और आकर्षक सजावट से सुसज्जित बैलगाड़ी तैयार की गई थी। बैलों को भी रंगीन धारियों, रिबन और मोरपंख से सजाया गया, जिससे दृश्य अत्यंत मनोहारी हो गया।

परंपराओं का संजीवनी रूप

मुकेश कुमावत और उनकी पत्नी मायादेवी ने मारवाड़ी वेशभूषा में बैलगाड़ी में सवार होकर स्वयं उसे हांका। इस आयोजन में डीजे पर पारंपरिक गीतों की धुन पर महिलाएं और पुरुष नृत्य कर रहे थे। "चाल चाल म्हारी नानीबाई कलश बंधावो…", "भर दे मायरो सांवरियो…" जैसे गीतों ने माहौल को और भी उल्लासपूर्ण बना दिया। बैलगाड़ी के साथ सैकड़ों लोग चलते हुए इस परंपरागत दृश्य का आनंद ले रहे थे, और हर स्थान पर महिलाएं मंगल गीत गा रही थीं।

धार्मिक उल्लास और आतिशबाजी

इस अनोखे आयोजन में धार्मिक उल्लास भी देखा गया। थाली और मादल की गूंज ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। जगह-जगह आतिशबाजी की गई और कई स्थानों पर मायरे का स्वागत भी हुआ। रास्ते में लोग इस दृश्य को देखकर खुश हो रहे थे और इस परंपरागत आयोजन का स्वागत कर रहे थे।

संगठन और सम्मान की बात

यह आयोजन स्कूल मैदान के पास स्थित धर्म बहन के घर पहुंचा, जहां सामाजिक रस्मों का विधिवत पालन किया गया। इस मौके पर जनप्रतिनिधि, प्रबुद्धजन और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।

पहले भी की थी ऐसी पहल

मुकेश कुमावत ने पहले भी समाज को परंपराओं से जोड़ने और नई पीढ़ी को उनसे परिचित कराने के उद्देश्य से ऐसी पहल की थी। गत वर्ष उन्होंने राजनगर में माली समाज की अपनी धर्म बहन के यहां भी बैलगाड़ी में मायरा भरा था। खास बात यह है कि मुकेश की कोई सगी बहन या बेटी नहीं है, इसलिए उन्होंने अपनी धर्म बहनों के मायरे पूरे सम्मान और परंपरा के साथ भरे हैं।

परंपराओं से जुड़ी रहना एक जिम्मेदारी

मुकेश कुमावत, जो राजसमंद के प्रसिद्ध आलू व्यापारी हैं, भले ही विदेशी लग्जरी कार के मालिक हैं, लेकिन उनके मन में पारंपरिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरा सम्मान है। उनका कहना है कि परंपराएं हमें आत्मिक शांति, सुकून और आनंद देती हैं, इसलिए इन्हें बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

लोगों की सराहना

रास्ते में बैलगाड़ी में मायरा जाता देख लोग इस पहल की खुले दिल से सराहना कर रहे थे। कई स्थानों पर इस पर चर्चा हो रही थी और लोग महसूस कर रहे थे कि यदि हम इन परंपराओं को नहीं बचाएंगे, तो आने वाली पीढ़ी इन्हें केवल किताबों में ही देख पाएगी।

मुकेश कुमावत ने यह साबित कर दिया कि आधुनिकता के बीच भी अपनी सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखा जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अच्छा संदेश दिया जा सकता है।

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