पाली के सादड़ी में शीतला अष्टमी पर ‘हामैळा’ का आयोजन हुआ

Edited By Anil Jangid, Updated: 16 Mar, 2026 02:30 PM

spine chilling maut ka naach in sadri pali

पाली: राजस्थान के पाली जिले के ऐतिहासिक कस्बे सादड़ी में शीतला अष्टमी के पावन अवसर पर एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने हर किसी की सांसें थम सी गईं। यह कोई साधारण लोक नृत्य नहीं था, बल्कि जोधपुर प्रांत की खतरनाक और अनोखी ‘हामैळा’ यानी मूसल गेर थी।...

पाली: राजस्थान के पाली जिले के ऐतिहासिक कस्बे सादड़ी में शीतला अष्टमी के पावन अवसर पर एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने हर किसी की सांसें थम सी गईं। यह कोई साधारण लोक नृत्य नहीं था, बल्कि जोधपुर प्रांत की खतरनाक और अनोखी ‘हामैळा’ यानी मूसल गेर थी। ढोल की थाप पर भैरव के रूप में सजे युवाओं ने हाथों में भारी मूसल और लकड़ी लेकर नृत्य करना शुरू किया।

 

युवाओं ने इन मूसलों को हवा में घुमाते हुए थिरकना, अपनी अदम्य शारीरिक शक्ति और साहस का परिचय देना, और लोक धुनों पर जोरदार नृत्य करना दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। सादड़ी की तंग गलियों में जब यह शौर्य का सैलाब उतरा, तो पूरी फिजा में उत्साह और ऊर्जा की लहर दौड़ गई। यह मारवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण था।

 

इतिहास में झांकें तो पता चलता है कि सादड़ी की इस मूसल गेर का निर्माण लगभग डेढ़ सौ साल पहले नाडोल रियासत के सगरवंशी माली समाज के 300 परिवारों ने किया था। समय के साथ इनमें से केवल 20-25 परिवार ही अब भी इस परंपरा को जीवित रख पाए हैं। बावजूद इसके, आधुनिकता के दौर में भी युवाओं में वही जोश और बुजुर्गों की आंखों में अपनी विरासत को बचाने की चमक आज भी बरकरार है।

 

इस गेर की सबसे डरावनी और महत्वपूर्ण विशेषता इसका ‘भैरव स्वरूप’ है। गेर में शामिल कलाकार स्वयं को भगवान भैरव के रूप में सजाते हैं – गहरे रंग, तीव्र आंखों का तेज और पारंपरिक आभूषण उन्हें साक्षात भैरव का रूप प्रदान करते हैं। भारी मूसल को हवा में घुमाते हुए वे पूरी तरह ढोल की थाप पर थिरकते हैं और मान्यता है कि इस नृत्य से भैरव देव खुश होकर पूरे साल समाज की रक्षा करते हैं।

 

सादड़ी और आसपास के इलाकों से भारी जनसैलाब इस अद्भुत और रूह कंपा देने वाले नृत्य को देखने के लिए उमड़ा। यह केवल लोक नृत्य नहीं, बल्कि साहस, आस्था और मारवाड़ी संस्कृति की अमूल्य विरासत का जीवंत दर्शन था।

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