झालावाड़ में श्रद्धा और उल्लास से मनाई गई बछ बारस, महिलाओं ने पुत्र सुख के लिए किया गौ माता का पूजन

Edited By Raunak Pareek, Updated: 20 Aug, 2025 04:14 PM

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झालावाड़ के सुनेल कस्बे में भाद्रपद कृष्ण द्वादशी पर बछ बारस का पर्व श्रद्धा और उल्लास से मनाया गया। महिलाओं ने पुत्र की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए गौ माता व बछड़े का पूजन किया। परंपरागत रीति-रिवाज, कथा श्रवण और आस्था से जुड़ी मान्यताओं के...

झालावाड़ जिले के सुनेल कस्बे में बुधवार, 20 अगस्त 2025 को भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि पर बछ बारस का पर्व बड़े ही श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। जन्माष्टमी के बाद आने वाले इस विशेष त्योहार का महत्व खासकर महिलाओं के लिए है, जो इसे अपने पुत्र की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना से करती हैं।

महिलाओं की भीड़ और विधिवत पूजन

सुबह से ही महिलाओं की भीड़ गौ माता और बछड़े की पूजा करने पहुंची। मंगल गीत गाते हुए उन्होंने गाय और बछड़े के भाल पर तिलक लगाकर पूजन किया। गायों को चूनरी ओढ़ाई गई और घर-घर के आगे गोबर से बनी तलाई में जल भरकर परंपरा निभाई गई। बछ बारस की कथा का श्रवण भी किया गया, जिसमें यह मान्यता दोहराई गई कि इस व्रत से पुत्रों की आयु लंबी होती है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

व्रत के दिन खानपान की विशेष परंपरा

इस दिन गाय के दूध और उससे बने उत्पादों का सेवन वर्जित माना जाता है। महिलाएं गेहूं और चाकू से कटी वस्तुओं का उपयोग नहीं करतीं। इसके बजाय बाजरा, मक्का और अंकुरित अनाज से बनी खाद्य वस्तुओं का सेवन किया जाता है। पूजन के बाद महिलाएं परिवार के साथ इन प्रसाद स्वरूप व्यंजनों का आनंद लेती हैं।

पौराणिक मान्यता और श्रीकृष्ण से जुड़ाव

कृष्णा मंडलोई, राष्ट्रीय अध्यक्ष "महिला इकाई" अखिल भारतीय श्री धाकड़ महासभा एवं भाजपा महिला मोर्चा जिला उपाध्यक्ष ने बताया कि बछ बारस का पर्व सदियों से हमारे ठिकानों पर मनाया जा रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद माता यशोदा ने इस दिन गौ माता का पूजन किया था।
भगवान कृष्ण ने स्वयं गायों को चराया और गोपाल कहलाए। इसीलिए गौ माता की रक्षा और उनका पूजन हर भारतीय का धर्म माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में भी गौ माता को समस्त तीर्थों का स्वरूप बताया गया है।

श्रद्धा, उल्लास और सामाजिक एकता

सुनेल कस्बे में मनाए गए इस पर्व ने न सिर्फ आस्था को जीवंत किया बल्कि समाज में एकता और धार्मिक संस्कृति की गहराई को भी प्रदर्शित किया। महिलाएं उत्साहपूर्वक इस पर्व में शामिल हुईं और परंपरा को आगे बढ़ाया। बछ बारस केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि यह हमारे समाज में गाय और बछड़े के प्रति स्नेह और कृतज्ञता की भी अभिव्यक्ति है। 

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