Edited By Sourabh Dubey, Updated: 12 Oct, 2026 07:30 PM

लोकतंत्र की मजबूती केवल निष्पक्ष चुनाव कराने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि मतदाता सूचियां तैयार करने, उनमें संशोधन करने और उन्हें अंतिम रूप देने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और समझने योग्य है।
टोंक। लोकतंत्र की मजबूती केवल निष्पक्ष चुनाव कराने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि मतदाता सूचियां तैयार करने, उनमें संशोधन करने और उन्हें अंतिम रूप देने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और समझने योग्य है। राजस्थान वक्फ बोर्ड के पूर्व चैयरमैन अबूबकर नकवी ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर हाल में हुई बहस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि चुनावी आंकड़ों को जनता के सामने किस तरह प्रस्तुत किया जाए, ताकि तथ्यों और दावों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा न हो। मतदाता सूची से करीब 13 करोड़ नाम हटाए जाने का दावा इसी बहस का प्रमुख हिस्सा रहा है।
उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, यह संख्या मसौदा चरण में विभिन्न श्रेणियों के अंतर्गत चिह्नित प्रविष्टियों से संबंधित बताई गई है। इनमें लगभग 2.8 करोड़ मृत मतदाता, 3 करोड़ अनुपस्थित या लापता, 6.3 करोड़ स्थायी रूप से स्थानांतरित और 1 करोड़ दोहरी प्रविष्टियों से जुड़े मामले शामिल बताए गए हैं। हालांकि, इन श्रेणियों के आंकड़ों को सीधे 13 करोड़ नामों के अंतिम विलोपन के बराबर मानना सही नहीं होगा। मसौदा सूची के बाद भी सत्यापन, दावे-आपत्तियों और अंतिम सूची तैयार करने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है।
यह अंतर केवल तकनीकी या प्रशासनिक विषय नहीं है, बल्कि मतदाताओं के अधिकारों और चुनावी व्यवस्था पर जनता के भरोसे से जुड़ा मामला है। इसलिए जरूरी है कि मसौदा सूची में दर्ज प्रविष्टियों, प्रस्तावित बदलावों, प्राप्त दावे-आपत्तियों और अंतिम रूप से हटाए गए नामों के आंकड़े अलग-अलग और स्पष्ट रूप में सामने रखे जाएं। इससे न केवल गलतफहमियां दूर होंगी, बल्कि पात्र मतदाताओं को भी अपने नाम की स्थिति समझने और जरूरत पडते पर सुधार कराने का अवसर मिलेगा।
शेषन के दौर से मिली पारदर्शिता की सीख
भारत के चुनावी इतिहास में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन का कार्यकाल एक महत्वपूर्ण दौर के रूप में याद किया जाता है। 1990 के दशक में उन्होंने चुनाव आयोग की शक्तियों का मुखरता से इस्तेमाल किया और आदर्श आचार संहिता के कड़ाई से पालन पर जोर दिया। उनके कार्यकाल ने चुनाव आयोग की भूमिका और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सार्वजनिक चर्चा को नई दिशा दी। उस दौर की अहम सीख यह थी कि किसी संवैधानिक संस्था की ताकत केवल उसके अधिकारों में नहीं, बल्कि उन अधिकारों के निष्पक्ष इस्तेमाल और जनता के सामने उसकी विश्वसनीयता में भी निहित होती है। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। सूचना तकनीक के विस्तार और सोशल मीडिया के प्रभाव ने किसी भी दावे को कुछ ही समय लाखों लोगों तक पहुंचाना आसान बना दिया है। ऐसे माहौल में अधूरी जानकारी या संदर्भ से अलग प्रस्तुत में किया गया आंकड़ा व्यापक भ्रम पैदा कर सकता है।
आंकड़ों की स्पष्टता से ही दूर होगा भ्रम
एसआईआर जैसी व्यापक प्रक्रिया में बड़ी संख्या में प्रविष्टियों की जांच और संशोधन स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन सकता है। लेकिन किसी आंकड़े का वास्तविक अर्थ समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि वह किस चरण से संबंधित है और उसके पीछे कौन-सी प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाई गई है। मसौदा सूची, प्रस्तावित विलोपन, दावे-आपत्तियां और अंतिम मतदाता सूची अलग-अलग चरण हैं। इन सभी को एक ही श्रेणी में रखकर देखना तथ्यात्मक भ्रम पैदा कर सकता है। ऐसी स्थिति में निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि वह केवल अपने संवैधानिक दर्जे का हवाला देने तक सीमित न रहे, बल्कि प्रक्रिया को सरल भाषा में समझाए।
आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कितने नाम किस कारण से जांच के दायरे में आए, कितने मामलों में आपत्तियां प्राप्त हुईं, कितने नामों में सुधार किया गया और अंतिम सूची में कितने नाम हटाए गए। प्रासंगिक आंकड़े सहज और सुलभ प्रारूप में उपलब्ध होने चाहिए, ताकि आम नागरिक भी उन्हें समझ सकें। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी संवैधानिक संस्था को हर आलोचना का जवाब देकर सभी को संतुष्ट करना होगा। स्वतंत्र संस्थाओं के लिए आलोचना और असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा हैं। लेकिन पारदर्शिता, स्पष्ट जानकारी और तर्कसंगत स्पष्टीकरण से संदेह को कम किया जा सकता है। जनता के सवालों को केवल अविश्वास के रूप में देखने के बजाय उन्हें प्रक्रिया को बेहतर बनाने के अवसर के रूप में भी समझा जाना चाहिए।
- अबूबकर नकवी, पूर्व चैयरमैन, राजस्थान वक्फ बोर्ड