Edited By LUCKY SHARMA, Updated: 01 Oct, 2026 06:08 PM
दो दिवसीय सेमिनार में पूर्वोत्तर के आठ राज्यों की कला, संस्कृति, लोक परंपराओं और सामाजिक जीवन पर विशेषज्ञों ने किया विचार-मंथन
जयपुर। पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध कला, संस्कृति और सामाजिक जीवन को समझने के उद्देश्य से जयपुर में दो दिवसीय सेमिनार की शुरुआत हुई। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर की ओर से राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर (RIC), जयपुर के सहयोग से आयोजित इस सेमिनार में नॉर्थ ईस्ट के आठ राज्यों की सांस्कृतिक परंपराओं, लोक कलाओं, साहित्य, संगीत और सामाजिक जीवन पर विशेषज्ञों ने विचार-मंथन किया।
सेमिनार के उद्घाटन अवसर पर पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर के निदेशक डॉ. अश्विन महेश दलवी ने कहा कि “पूर्वोत्तर में कला महलों में नहीं, जीवन में बसती है।” उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर के हर रंग और हर बनावट में वहां की संस्कृति दिखाई देती है।
डॉ. दलवी ने कहा कि सेमिनार का उद्देश्य पूर्वोत्तर के आठ राज्यों, जिन्हें ‘आठ रत्न’ कहा जाता है, की कला, संस्कृति और सामाजिक जीवन पर चर्चा करना है। साथ ही विशेषज्ञ राजस्थान और पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक समानताओं पर भी विचार रखेंगे।
दीप प्रज्वलन के साथ हुआ सेमिनार का शुभारंभ
उद्घाटन से पहले डॉ. अश्विन महेश दलवी, सेमिनार संयोजक एवं सिक्किम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संतोष कुमार, पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के पूर्व निदेशक फुरकान खान और केंद्र के उप निदेशक पवन अमरावत ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की।
इस अवसर पर सेमिनार संयोजक प्रोफेसर संतोष कुमार ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत पुरातन भारत का जीवंत प्रतिबिंब है।
पहले सत्र में एथनिक और वैष्णवी संस्कृति पर चर्चा
सेमिनार के पहले सत्र में असम के डॉ. असीम बोरा ने ‘एथनिक और वैष्णवी संस्कृति का पूर्वोत्तर भारत में संगम’ विषय पर विस्तार से चर्चा की।
वहीं डॉ. पूजा बासनेत ने ‘सिक्किम की लोककथाएं, मौखिक परंपराएं एवं विश्वास : कथाएं, परंपरा एवं सांस्कृतिक पहचान’ विषय पर अपने विचार रखे। इस सत्र का संचालन प्रोफेसर रविरंजन ने किया।
मेघालय के पारंपरिक नृत्य और नागालैंड के साहित्य पर मंथन
दूसरे सत्र में विदुषी मौनिका चंदा ने ‘पूर्वोत्तर की संस्कृति की अंतर्दृष्टि : मेघालय के पारंपरिक नृत्य के माध्यम से’ विषय पर प्रस्तुति दी।
इसके साथ ही प्रोफेसर रविरंजन ने ‘पूर्वोत्तर का साहित्य : नागालैंड के विशेष संदर्भ में’ विषय पर विस्तार से चर्चा की। इस सत्र का संचालन डॉ. असीम बोरा ने किया।
पूर्वोत्तर के वाद्य यंत्रों और मणिपुर की परंपरा पर चर्चा
तीसरे सत्र में डॉ. संतोष कुमार ने ‘पूर्वोत्तर भारत के सुषिर वाद्य’ विषय पर चर्चा करते हुए क्षेत्र में प्रचलित विभिन्न वाद्य यंत्रों की जानकारी दी।
वहीं डॉ. युमनम भूमेश्वर ने ‘मणिपुर का नट संकीर्तन : पूर्वोत्तर भारत का एक दुर्लभ रिवाज’ विषय पर अपने विचार रखे।
सेमिनार में सभी विद्वान वक्ताओं ने पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से अपने विषयों पर विस्तार से जानकारी दी।
शुक्रवार को भी जारी रहेगा विचार-मंथन
दो दिवसीय सेमिनार का दूसरा दिन शुक्रवार सुबह 10 बजे शुरू होगा। दूसरे दिन भी पूर्वोत्तर भारत की कला, संस्कृति, लोक परंपराओं और सामाजिक जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों की ओर से चर्चा और प्रस्तुतियां दी जाएंगी।
इस सेमिनार का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक विविधता को व्यापक स्तर पर समझने के साथ राजस्थान और पूर्वोत्तर के बीच मौजूद सांस्कृतिक संबंधों और समानताओं पर भी संवाद को आगे बढ़ाना है।