Edited By Anil Jangid, Updated: 13 Sep, 2026 09:21 AM

पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर –जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि इस साल गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाया जाएगा और बप्पा के भक्त गणपति की प्रतिमा को घर में लाकर उनकी भक्ति भाव से पूजा करेंगे।
जयपुर। सनातन धर्म में गणेश चतुर्थी के त्योहार का खास महत्व है। विनायक को समृद्धि और बुद्धि का देवता माना जाता है। गणेश चतुर्थी का त्योहार भाद्रपद माह की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। भगवान गणेश को प्रथम देव माना जाता है। किसी भी शुभ काम को शुरू करने से पहले लंबोदर की पूजा की जाती है। इस साल 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर –जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि इस साल गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाया जाएगा और बप्पा के भक्त गणपति की प्रतिमा को घर में लाकर उनकी भक्ति भाव से पूजा करेंगे। इस साल गणेश चतुर्थी का उत्सव 14 सितंबर से शुरू होगा, जबकि गणेश विसर्जन 25 सितंबर के दिन किया जाएगा। गणेश चतुर्थी के दिन ब्रह्म योग दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा। वहीं चित्रा नक्षत्र दोपहर 1:55 बजे तक रहेगा। ऐसे में ब्रह्म योग के दौरान गणपति पूजन, संकल्प और मंत्र जाप को विशेष शुभ माना जा रहा है। श्रद्धालु इस दौरान भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सकेंगे। हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल की चतुर्थी से देशभर में गणेश चतुर्थी पर्व का शुभारंभ हो जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से 10 दिनों तक चलता है। इस दौरान भक्त बप्पा को अपने घर लाते हैं और अनंत चतुर्दशी के दिन बप्पा को विदा कर देते हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का पावन पर्व मनाया जाता है। गणेश महोत्सव का पर्व चतुर्थी तिथि से प्रारंभ होकर अगले 10 दिनों तक चलता है। वहीं अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान गणेश को विदा किया जाता है। इस बार उदया तिथि के आधार पर 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी का व्रत रखा जाने वाला है। माना जाता है कि गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को नहीं देखना चाहिए। इससे श्राप लगता है। वहीं गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की मूर्ति स्थापना शुभ मुहूर्त में ही करनी चाहिए।
गणेश चतुर्थी तिथि
सनातन धर्म में गणेश चतुर्थी के पर्व का विशेष महत्व होता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 14 सितंबर सुबह 7:06 बजे शुरू होगी। वहीं 15 सितंबर सुबह 7:44 मिनट पर चतुर्थी तिथि का समापन होगा। सनातन धर्म में उदया तिथि मान है। इसके लिए 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी को मनाई जाएगी।
शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार गणेश पूजन के लिए मध्याह्न काल (वृश्चिक लग्र सहित) को श्रेष्ठ माना गया है। गणेश पूजन हेतु मध्याह्न काल (वृश्चिक लग्न सहित) प्रातः 11:08 से प्रातः 11:58 तक रहेगा। अमृत का चौघड़िया प्रातः 06:16 से प्रातः 07:48, शुभ का चौघड़िया प्रातः 09:19 से प्रातः 10:51, अभिजित् प्रातः 11:58 से दोपहर 12:46 तक रहेगा।
ब्रह्म योग
गणेश चतुर्थी के दिन ब्रह्म योग दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा। वहीं चित्रा नक्षत्र दोपहर 1:55 बजे तक रहेगा। ऐसे में ब्रह्म योग के दौरान गणपति पूजन, संकल्प और मंत्र जाप को विशेष शुभ माना जा रहा है। श्रद्धालु इस दौरान भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सकेंगे।
गणेश विसर्जन तिथि
शास्त्रों के अनुसार गणेश चतुर्थी पर्व का समापन अनंत चतुर्दशी के दिन किया जाता है। साथ ही इसी दिन बप्पा को श्रद्धापूर्वक विदा किया जाता है। पंचांग के अनुसार गणेश विसर्जन 25 सितंबर 2026 को किया जाएगा।
महत्व
हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ और मांगलिक कार्यक्रम में सबसे पहले गणेशी जी वंदना और पूजा की जाती है। भगवान गणेश बुद्धि, सुख-समृद्धि और विवेक का दाता माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश जी का जन्म भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि, स्वाति नक्षत्र और सिंह लग्न में दोपहर के प्रहर में हुआ था। ऐसे में गणेश चतुर्थी के दिन पर अगर आप घर पर भगवान गणेश की मूर्ति की स्थापना करने जा रहे है तो दोपहर के शुभ मुहूर्त में करना होता है। गणेश चतुर्थी तिथि लेकर अनंत चतुर्दशी तक यानी लगातार 10 दिनों तक विधि-विधान के साथ गणेश जी की पूजा उपासना किया जाता है। गणेश जी की पूजा करने से जीवन में आने वाली सभी तरह की बाधाएं और संकट दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
पूजा विधि
गणेश चतुर्थी तिथि पर शुभ मुहूर्त को ध्यान मे रखकर सबसे पहले अपने घर के उत्तर भाग, पूर्व भाग, अथवा पूर्वोत्तर भाग में गणेश जी की प्रतिमा रखें। फिर पूजन सामग्री लेकर शुद्ध आसन पर बैठें। पूजा सामग्री में दूर्वा, शमी पत्र,लड्डू, हल्दी, पुष्प और अक्षत से ही पूजन करके गणेश जी को प्रसन्न किया जा सकता है। गणेश जी की आराधना केवल दूर्वा से भी की जा सकती है। सर्वप्रथम गणेश जी को चौकी पर विराजमान करें और नवग्रह, षोडश मातृका आदि बनाएं। चौकी के पूर्व भाग में कलश रखें और दक्षिण पूर्व में दीया जलाएं। अपने ऊपर जल छिड़कते हुए ॐ पुंडरीकाक्षाय नमः कहते हुए भगवान विष्णु को प्रणाम करें और तीन बार आचमन करें तथा माथे पर तिलक लगाएं। यदि आपको कोई भी मंत्र नहीं आता तो ‘ॐ गं गणपतये नमः। इसी मंत्र से सारी पूजा संपन्न कर सकते हैं। हाथ में गंध अक्षत और पुष्प लें और दिए गए मंत्र को पढ़कर गणेश जी का ध्यान करें। इसी मंत्र से उन्हें आवाहन और आसन भी प्रदान करें। पूजा के आरंभ से लेकर अंततक अपने जिह्वा पर हमेशा ॐ श्रीगणेशाय नमः। ॐ गं गणपतये नमः। मंत्र का जाप अनवरत करते रहें। आसन के बाद गणेश जी को स्नान कराएं। पंचामृत हो तो और भी अच्छा रहेगा और नहीं हो तो शुद्ध जल से स्नान कराएं। उसके बाद वस्त्र, जनेऊ, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, फल आदि जो भी संभव यथाशक्ति उपलब्ध हो उसे चढ़ाएं। पूजा के पश्चात इन्हीं मंत्रों से गणेश जी की आरती करें। पुनः पुष्पांजलि हेतु गंध अक्षत पुष्प से इन मंत्रों ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात्। से पुष्पांजलि अर्पित करें, तत्पश्चात गणेश जी की तीन बार प्रदक्षिणा करें।