ईरान की वजह से बीकानेर पर आया बड़ा संकट, ऐसे लगा 2 हजार करोड़ का फटका

Edited By Anil Jangid, Updated: 25 Jan, 2026 05:35 PM

political crisis in iran impacted bikaner wool industry

बीकानेर. ईरान पर आए संकट की वजह से एशिया की कभी सबसे बड़ी ऊन मंडी रहा बीकानेर आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। ट्रेड वॉर और ईरान में जारी अस्थिरता का असर ऊन के व्यापार पर दिख रहा है। पिछले करीब 4 महीनों से ईरान से ऊन का आयात पूरी तरह ठप पड़ा हुआ...

बीकानेर. ईरान पर आए संकट की वजह से एशिया की कभी सबसे बड़ी ऊन मंडी रहा बीकानेर आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। ट्रेड वॉर और ईरान में जारी अस्थिरता का असर ऊन के व्यापार पर दिख रहा है। पिछले करीब 4 महीनों से ईरान से ऊन का आयात पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है। यहां मुख्य रूप से कालीन धागा यानी कार्पेट यार्न तैयार किया जाता है। वर्तमान में 2000 करोड़ से अधिक के सालाना टर्नओवर वाले इस उद्योग में लगभग 300 से 350 यूनिट सक्रिय हैं, लेकिन यह अब स्थानीय उत्पादन कम होने के कारण आयातित ऊन पर निर्भर है. ऐसे में वूलन इंडस्ट्री को करोड़ों का नुकसान हो रहा है. वहीं, व्यापारी कारोबार को वापस पटरी पर लाने के लिए नए बाजार तलाश रहे हैं. 

 

बीकानेर का ऊन कारोबार एक ऐतिहासिक और समृद्ध विरासत है. यह कभी एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी के रूप में विख्यात था. 18वीं शताब्दी से ही यह शहर ऊन और कंबल निर्यात का प्रमुख केंद्र रहा है, जिसका व्यापार काबुल मुल्तान तक फैला था. यह शहर अपनी उच्च गुणवत्ता वाली देशी ऊन, ऊनी धागे के उत्पादन और कालीन निर्माण के लिए प्रसिद्ध है. 1950 के दशक में बीकानेर में पहली धागा बनाने की फैक्ट्री स्थापित की गई. 

 

यहां से रोज करीब तीन लाख किलो ऊन ईरान से आती थी. यहां ऊन की प्रोसेसिंग और सफाई के बाद उसे वापस ईरान भेजा जाता था. वहां विश्व प्रसिद्ध पर्शियन कार्पेट तैयार किए जाते हैं. हर महीने औसतन 25 कंटेनर ऊन ईरान से बीकानेर पहुंचते थे, लेकिन वर्तमान अस्थिर हालात के चलते न तो माल आ रहा है और न ही वहां से किसी प्रकार का संपर्क संभव हो पा रहा है. उन्होंने बताया कि पहले ईरान में टैरिफ और टैक्स की दिक्कतें थीं, लेकिन अब वहां नेटवर्क बंद होने और अस्थिरता के कारण व्यापार पूरी तरह रुक गया है. 

 

इससे अगले दो से तीन महीनों तक भी हालात सामान्य होने की उम्मीद कम है. कच्चे माल की कमी के चलते उद्योग को मजबूरी में दूसरे देशों की ओर देखना पड़ रहा है. हालांकि, यूरोप के देशों से ऊन मंगाने पर लागत 40 से 50 रुपये प्रति किलो तक बढ़ सकती है. इससे उत्पादन महंगा होगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाएगा.

 

बताया जा रहा है कि अब इटली, सीरिया, सऊदी अरब, बेल्जियम और आयरलैंड जैसे देशों से संपर्क किया जा रहा है, ताकि उद्योग को किसी तरह बचाया जा सके. अब क्षेत्र में भेड़ पालन भी लगातार घट रहा है. नई पीढ़ी इस व्यवसाय की ओर आकर्षित नहीं हो रही है, जिससे स्थानीय स्तर पर ऊन की उपलब्धता भी कम हो गई है. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि बजट में बीकानेर के आसपास भेड़ फार्म विकसित करने की योजना लाई जाए और भेड़पालकों को सब्सिडी मिले. धन्यवाद।

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