9 अगस्त : विश्व आदिवासी दिवस विशेषांक, इतिहास के पन्नों में ओझल एक आदिवासी क्रांतिकारी पदिया मीणा

Edited By Anil Jangid, Updated: 08 Aug, 2026 03:50 PM

world tribal day august 9 special feature on padia meena

डूंगरपुर। इतिहास में ऐसे अनेक लोकनायक हुए हैं जिन्होंने अन्याय, शोषण और दमन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वंचित समाज के संरक्षण का दायित्व निभाया। इंग्लैंड के रॉबिन हुड और मध्य भारत के आदिवासी महानायक टंट्या भील इसी परंपरा के विश्वविख्यात उदाहरण हैं

डूंगरपुर। इतिहास में ऐसे अनेक लोकनायक हुए हैं जिन्होंने अन्याय, शोषण और दमन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वंचित समाज के संरक्षण का दायित्व निभाया। इंग्लैंड के रॉबिन हुड और मध्य भारत के आदिवासी महानायक टंट्या भील इसी परंपरा के विश्वविख्यात उदाहरण हैं। टंट्या भील को भारतीय इतिहास और जनस्मृति में लंबे समय से "इंडियन रॉबिन हुड" कहा जाता है, क्योंकि वे गरीबों के संरक्षक, औपनिवेशिक शासन के विरोधी तथा जनप्रतिरोध के प्रतीक के रूप में स्थापित हैं। इसी परंपरा में मारवाड़ के आदिवासी जननायक पदिया मीणा का स्थान भी विशेष महत्व रखता है। इतिहासकार सुभाषचंद्र कुशवाहा ने अपनी पुस्तक मारवाड़ के डकैत और रॉबिनहुड : पदिया मीणा में मरदुमशुमारी राज मारवाड़ (1891), राजस्थान की जातियाँ (बजरंग लाल लोहिया, 1954), The Times of India (26 जुलाई 1888) तथा अन्य ऐतिहासिक स्रोतों के अध्ययन के आधार पर पदिया मीणा को "मारवाड़ का रॉबिन हुड" कहा है। उनके अनुसार यह उपाधि पदिया मीणा के उस लोकनायक स्वरूप का प्रतीक है, जिसमें वे शोषणकारी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष करने वाले तथा निर्धनों, किसानों और वंचितों के संरक्षक के रूप में उभरते हैं।

 

इसी प्रकार लेखक बजरंग लाल लोहिया ने अपनी पुस्तक राजस्थान की जातियाँ में पदिया मीणा की तुलना मध्य भारत के महान आदिवासी जननायक टंट्या भील से की है। उनके अनुसार जिस प्रकार टंट्या भील ने मध्य भारत में अंग्रेजी शासन और सामंती शोषण के विरुद्ध जनआंदोलन का नेतृत्व किया, उसी प्रकार पदिया मीणा ने मारवाड़ में आदिवासी समाज, किसानों और वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा हेतु संघर्ष करते हुए व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया। यद्यपि रॉबिन हुड, टंट्या भील और पदिया मीणा तीन अलग-अलग देशों, क्षेत्रों और ऐतिहासिक परिस्थितियों से जुड़े व्यक्तित्व हैं, फिर भी इनके जीवन में एक समान तत्व स्पष्ट दिखाई देता है—अन्यायपूर्ण सत्ता के विरुद्ध निर्भीक प्रतिरोध, शोषित एवं वंचित समाज के प्रति संवेदनशीलता तथा जनसाधारण के बीच असाधारण लोकप्रियता। यही कारण है कि आधुनिक इतिहासलेखन और क्षेत्रीय लोकस्मृतियों में पदिया मीणा को "मारवाड़ का रॉबिन हुड" तथा टंट्या भील के समकक्ष आदिवासी जननायक के रूप में स्मरण किया जाता है।

 

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    एक नज़र : पदिया मीणा
    पदिया मीणा का जन्म 9 अगस्त 1836 को वर्तमान राजस्थान के जालोर जिले के भाद्राजून में आदिवासी मीणा समाज के एक परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्होंने किसानों, पशुपालकों और आदिवासी समुदाय पर होने वाले अत्याचारों को निकट से देखा, जिसने उनके व्यक्तित्व में सामाजिक न्याय, स्वाभिमान और संघर्ष की भावना को मजबूत बनाया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, विशेषकर ऐरिनपुरा छावनी के विद्रोह, से उनका नाम जोड़ा जाता है। उन्होंने विद्रोही सैनिकों को जनसमर्थन प्रदान किया तथा इसके बाद लगभग तीन दशकों तक मारवाड़ में औपनिवेशिक शासन और सामंती शोषण के विरुद्ध जनप्रतिरोध का नेतृत्व किया। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित होकर मारवाड़ रियासत, सिरोही राज्य और ब्रिटिश प्रशासन ने उनके विरुद्ध संयुक्त अभियान चलाया। अंततः अगस्त 1887 में उन्हें पाली जिले के अणगोर गाँव से गिरफ्तार कर लिया गया। लोकपरंपरा के अनुसार उनकी गिरफ्तारी का समाचार सुनकर उनकी माता ने कहा—
    "तूने मेरा दूध लजाया है। जब तुझे पकड़ने की कोशिश हुई तो तूने आत्महत्या क्यों नहीं कर ली? क्या मैंने तुझे इसलिए जन्म दिया था कि तू नामर्दों की मौत मरे?"

     

    यह कथन केवल एक माँ की पीड़ा नहीं, बल्कि उस परिवार और समाज में निहित वीरता, स्वाभिमान और बलिदान की परंपरा का प्रतीक माना जाता है। लगभग 1857 से 1887 तक चले संघर्ष के उपरांत 5 नवम्बर 1887 को जोधपुर में पदिया मीणा को फाँसी देकर मृत्युदंड दिया गया। उनका बलिदान मारवाड़ के आदिवासी प्रतिरोध के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। आज पदिया मीणा आदिवासी स्वाभिमान, जनप्रतिरोध, सामाजिक न्याय और बलिदान के अमर प्रतीक के रूप में स्मरण किए जाते हैं। इतिहास के पुनर्पाठ के साथ उनका व्यक्तित्व केवल मारवाड़ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वे भारतीय आदिवासी प्रतिरोध की उस गौरवशाली परंपरा के प्रतिनिधि के रूप में उभर रहे हैं, जिसकी कड़ी इंग्लैंड के रॉबिन हुड और मध्य भारत के महानायक टंट्या भील से भी जोड़ी जाती है।

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