एनएचआरसी की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, हिरासत में बंदियों की मौतों के मामले में राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर

Edited By Anil Jangid, Updated: 28 Mar, 2026 05:29 PM

nhrc report reveals shocking statistics rajasthan ranks second

बांसवाड़ा: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की ताजा रिपोर्ट में राजस्थान की पुलिस हिरासत में बंदियों की मौतों के मामले में बड़े आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान इस मामले में देश में दूसरे स्थान पर है, जबकि बिहार पहले स्थान पर है।

बांसवाड़ा: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की ताजा रिपोर्ट में राजस्थान की पुलिस हिरासत में बंदियों की मौतों के मामले में बड़े आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान इस मामले में देश में दूसरे स्थान पर है, जबकि बिहार पहले स्थान पर है। पिछले साल राजस्थान के पुलिस कारागारों में 9 मौतें दर्ज की गई थीं, जो इस वर्ष बढ़कर 18 तक पहुँच गईं। यह आंकड़ा राजस्थान में पुलिस विभाग के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है।

 

एनएचआरसी की रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि वित्तीय वर्ष 25-26 में 15 मार्च तक पूरे देश में पुलिस हिरासत में 170 मौतें हुईं, जिनमें से 19 मौतें बिहार में, 18 राजस्थान में और 15 उत्तर प्रदेश में दर्ज की गईं। इन आंकड़ों में वे मौतें भी शामिल हैं, जो विचाराधीन बंदियों की थीं या जिनकी पुलिस जांच चल रही थी।

 

राजस्थान में हिरासत में हुई मौतों के मामलों में एक महत्वपूर्ण और चर्चित मामला डूंगरपुर के दिलीप अहारी की मौत से जुड़ा है। दिलीप को चोरी के शक में हिरासत में लिया गया था, और 26 सितंबर को उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद इलाके में आक्रोश फैल गया और लोगों ने कलक्ट्रेट का घेराव किया। इसके परिणामस्वरूप, थानेदार सहित पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया और मृतक के परिवार को 27.50 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया।

 

राज्य में पुलिस हिरासत में मौतों की बढ़ती संख्या ने नागरिकों और मानवाधिकार संगठनों को चिंतित कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली और मानवीय अधिकारों की अवहेलना को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। हालांकि, पुलिस विभाग और सरकार ने इन मामलों की जांच शुरू कर दी है, और दोषी पाए गए पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाने की उम्मीद जताई जा रही है।

 

इस रिपोर्ट के बाद, राजस्थान में पुलिस हिरासत में मौतों के मामलों की जांच के लिए नई नीतियों और प्रोटोकॉल को लागू करने की मांग तेज हो गई है।

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