‘रायड़ा’ के फेर में फंसी सरसों, नागौर के सिर्फ 7 किसानों को मिला MSP का लाभ

Edited By Anil Jangid, Updated: 24 May, 2026 04:14 PM

mustard crop stuck in raida confusion only 7 farmers got msp benefit in nagaur

नागौर। राजस्थान में स्थानीय भाषा और बोलचाल कई बार प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर भारी पड़ जाती है। ऐसा ही मामला नागौर जिले में सामने आया है, जहां सरसों को स्थानीय भाषा में ‘रायड़ा’ लिखे जाने के कारण हजारों किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का लाभ लेने से...

नागौर। राजस्थान में स्थानीय भाषा और बोलचाल कई बार प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर भारी पड़ जाती है। ऐसा ही मामला नागौर जिले में सामने आया है, जहां सरसों को स्थानीय भाषा में ‘रायड़ा’ लिखे जाने के कारण हजारों किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का लाभ लेने से वंचित रह गए। सरकारी रिकॉर्ड में ‘सरसों’ की जगह ‘रायड़ा’ दर्ज होने के कारण ऑनलाइन सत्यापन प्रणाली ने किसानों के पंजीयन निरस्त कर दिए। परिणामस्वरूप पूरे जिले में केवल सात किसानों की ही सरसों एमएसपी पर खरीदी जा सकी।

 

दरअसल, केंद्र सरकार की ओर से सरसों खरीद के लिए नैफेड ने राजस्थान में राजफैड को अधिकृत किया है। राजफैड द्वारा किसानों से एमएसपी पर उपज खरीदने के लिए ऑनलाइन पंजीयन प्रक्रिया शुरू की गई थी। किसानों को अपने खेत के चक और खसरा नंबर पोर्टल पर दर्ज करने थे। इसके बाद सिस्टम ने इन खसरों का मिलान ऑनलाइन गिरदावरी रिकॉर्ड से किया। लेकिन गिरदावरी में सरसों की फसल ‘रायड़ा’ नाम से दर्ज होने के कारण पोर्टल ने इसे सरसों की फसल मानने से इनकार कर दिया और पंजीयन रिजेक्ट कर दिए।

 

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    जानकारी के अनुसार पटवारियों ने स्थानीय प्रचलन के अनुसार गिरदावरी में ‘रायड़ा’ दर्ज किया था। हालांकि पिछले वर्षों में भी यही शब्द उपयोग में लिया जाता रहा है, लेकिन तब गिरदावरी की हार्ड कॉपी अपलोड होती थी और अधिकारियों द्वारा इसे सरसों के रूप में स्वीकार कर लिया जाता था। इस बार पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन और ऑटोमेटिक वेरिफिकेशन आधारित होने से यह तकनीकी गड़बड़ी किसानों पर भारी पड़ गई।

     

    सरकारी समितियों ने इस समस्या से केंद्र और राज्य सरकार को अवगत भी कराया, लेकिन समय रहते समाधान नहीं हो सका। इसका असर यह हुआ कि जिले में इस साल करीब 82 हजार मीट्रिक टन सरसों उत्पादन होने के बावजूद केवल 13.15 मीट्रिक टन सरसों की खरीद एमएसपी पर हो पाई। यह खरीद भी केवल सात किसानों से की गई।

     

    हजारों किसानों को मजबूरी में अपनी उपज बाजार मूल्य पर बेचनी पड़ी, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। किसानों और कृषि संगठनों ने इस मामले में प्रशासनिक लापरवाही बताते हुए सरकार से राहत और उचित समाधान की मांग की है।

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