आम के पेड़ के नीचे पढ़ाई… बकरियां चराईं, अब बनी पुलिस कॉन्स्टेबल | आदिवासी बेटियों की प्रेरक कहानी

Edited By Kuldeep Kundara, Updated: 08 Mar, 2026 05:51 PM

inspiring story of tribal daughters

सिरोही। यह जिला आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है, जहां आज भी शिक्षा, चिकित्सा और बुनियादी सुविधाओं के लिए लोगों को संघर्ष करना पड़ता है।

सिरोही। यह जिला आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है, जहां आज भी शिक्षा, चिकित्सा और बुनियादी सुविधाओं के लिए लोगों को संघर्ष करना पड़ता है। ऐसे कठिन हालात के बीच यदि कोई बेटी मेहनत और दृढ़ संकल्प के दम पर सफलता हासिल करती है, तो वह केवल अपने परिवार ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाती है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम आपको सिरोही जिले की ऐसी ही बेटियों की कहानी से रूबरू करवा रहे हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को सच कर दिखाया। सिरोही जिले के आबूरोड और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों की करीब दो दर्जन से अधिक गरासिया समाज की बालिकाओं ने कठिन संघर्ष करते हुए राजस्थान पुलिस में अपनी जगह बनाई है। इनमें से एक प्रेरणादायक नाम है महिला कॉन्स्टेबल कांता कुमारी, जो वर्तमान में सिरोही कोतवाली थाने में पदस्थापित हैं।

आम के पेड़ के नीचे पढ़ाई से शुरू हुआ सफर
कांता कुमारी का जन्म आबूरोड तहसील के दूरस्थ आदिवासी गांव मीन जांबूड़ी में हुआ। उनके पिता रमाजी एक सामान्य किसान हैं, जो केवल मौसमी खेती से परिवार का गुजारा करते हैं। गांव पहाड़ियों के बीच लगभग 40–45 किलोमीटर दूर स्थित है, जहां लंबे समय तक मूलभूत सुविधाओं का अभाव रहा।  कांता बताती हैं कि उनके गांव में स्कूल भवन भी नहीं था। ऐसे में कक्षा पहली से पांचवीं तक की पढ़ाई उन्होंने आम के पेड़ के नीचे बैठकर की। एक महिला पैराटीचर ही सभी बच्चों को पढ़ाती थीं। छठी कक्षा के बाद परिस्थितियों के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी और घर की जिम्मेदारी संभालते हुए बकरियां चराने लगीं।

एनजीओ ने बदली जिंदगी की दिशा
साल 2004-05 में एक सामाजिक संस्था “दूसरा दशक परियोजना” के कार्यकर्ता उनके गांव पहुंचे। उन्होंने कांता को पढ़ाई के लिए आबूरोड में आयोजित चार माह के आवासीय शिविर में शामिल करवाया। यहीं से कांता की जिंदगी ने नई दिशा पकड़ी। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने आत्मविश्वास, अनुशासन और जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलू सीखे।

मां ने गिरवी रखे गहने, बेटी ने नहीं छोड़ा सपना 
परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। कई बार पढ़ाई जारी रखने के लिए कांता को मजदूरी और रोजगार गारंटी योजना में भी काम करना पड़ा। उनकी मां ने बेटी की पढ़ाई के लिए अपने गहने गिरवी रख दिए और घर का अनाज तक बेच दिया। कांता बताती हैं कि आज भी उनके गांव में वे सबसे अधिक शिक्षित हैं—उन्होंने एमए और बीएड तक की पढ़ाई पूरी की है। 

समाज के ताने भी सुने
कांता कहती हैं कि पढ़ाई के दौरान उन्हें समाज के ताने भी सुनने पड़े। गांव के लोग कहते थे कि “आज तक किसी लड़की ने पढ़ाई नहीं की, कांता पढ़कर क्या कर लेगी।” कुछ लोग यह तक कहते थे कि लड़की को बाहर पढ़ने भेजोगे तो वह भाग जाएगी। हालांकि उनके पिता ने हमेशा उनका साथ दिया, लेकिन बड़ा भाई चाहता था कि वह पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करें। इस बात को लेकर कई बार घर में विवाद भी हुआ। कांता मुस्कुराते हुए बताती हैं कि भाई ने एक बार मजाक में कहा था—“तेरी शादी में दहेज के रूप में किताबें दूंगा।” इस पर उन्होंने जवाब दिया—“मुझे दहेज नहीं चाहिए, अगर किताबें दोगे तो खुशी से स्वीकार करूंगी।”

प्रेरणा बनी पुलिस वर्दी
कांता को पुलिस सेवा में आने की प्रेरणा हेड कॉन्स्टेबल सुमन राठौड़ को देखकर मिली। उन्होंने शिक्षक बनने की तैयारी करते हुए पहली बार पुलिस भर्ती परीक्षा दी और वर्ष 2017 में राजस्थान पुलिस में कॉन्स्टेबल पद पर चयनित हो गईं।

राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से भी मिलीं 

कांता के संघर्षपूर्ण जीवन में एक यादगार क्षण वह भी रहा जब वर्ष 2007 में “दूसरा दशक परियोजना” के तहत उन्हें भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से मिलने का अवसर मिला। यह मुलाकात उनके लिए जीवन में आगे बढ़ने की बड़ी प्रेरणा बनी। 

अब गांव की बेटियों के लिए प्रेरणा
आज वही लोग जो कभी ताने मारते थे, गर्व से कहते हैं—“यह हमारे गांव की बेटी है, जो पुलिस में सेवा दे रही है।” कांता कहती हैं कि उनके जीवन में आज भी कई पारिवारिक चुनौतियां हैं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनका मानना है कि इंसान को हमेशा संघर्षशील रहना चाहिए।

कई बेटियों ने लिखी सफलता की कहानी
यह कहानी केवल कांता कुमारी की नहीं है। सिरोही जिले के आबूरोड और पिंडवाड़ा क्षेत्र की कई आदिवासी बेटियों ने पुलिस सेवा में स्थान हासिल कर समाज में नई मिसाल पेश की है। इनमें हेड कॉन्स्टेबल सुमन राठौड़, पिंडवाड़ा थाने में तैनात केली कुमारी सहित कई बालिकाएं शामिल हैं, जो आज गरासिया समाज की बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।

समाज के लिए गर्व की बात
सीमित संसाधनों, आर्थिक तंगी और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद इन बेटियों ने साबित कर दिया कि अगर मन में कुछ करने का दृढ़ संकल्प हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती। आज इन बेटियों की सफलता से न केवल उनका परिवार बल्कि पूरा समाज, जिला और प्रदेश गर्व महसूस कर रहा है।

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