क्रांतिवीर केसरी सिंह बारहठ केवल व्यक्ति नहीं, एक विचार थे” — शाहपुरा में शौर्य दिवस पर बोले केंद्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत

Edited By Kuldeep Kundara, Updated: 24 Dec, 2025 12:58 PM

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केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि क्रांतिवीर ठाकुर केसरी सिंह बारहठ केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वे एक विचार थे। ऐसा विचार, जो गुलामी को कभी स्वीकार नहीं करता था

शाहपुरा (भीलवाड़ा) । केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि क्रांतिवीर ठाकुर केसरी सिंह बारहठ केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वे एक विचार थे। ऐसा विचार, जो गुलामी को कभी स्वीकार नहीं करता था। सत्ता के गलियारों में रहते हुए भी उन्होंने कभी सच बोलने और राष्ट्रहित से समझौता नहीं किया। 

बारहठ त्रिमूर्ति स्मारक को समर्पित ‘शौर्य दिवस’, स्मारक की स्वर्ण जयंती और देवखेड़ा में स्थापित क्रांतिवीर ठाकुर केसरी सिंह बारहठ की प्रतिमा अनावरण समारोह में केंद्रीय मंत्री शेखावत ने कहा कि अंग्रेजों के खिलाफ चली अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों में उनकी भूमिका अग्रणी रही। फरवरी 1903 के प्रसंग का जिक्र करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हम सब कैसे भूल सकते हैं? जब दिल्ली दरबार में अंग्रेजी सत्ता अपनी शान-ओ-शौकत के प्रदर्शन में जुटी हुई थी। भारत के देशी रियासतों के शासकों को अपनी अधीनता दिखाने के लिए दिल्ली बुलाया जा रहा था। मेवाड़ के महाराणा फतेहसिंह भी आमंत्रित थे, लेकिन केसरी सिंह बारहठ ने इसे केवल एक दरबार नहीं, अपितु भारत के स्वाभिमान की परीक्षा माना। 

उन्होंने महाराणा को रोकने के लिए कोई दबाव नहीं बनाया, लेकिन उन्होंने ‘चेतावनी रा चुंगाट्या’, तेरह सोरठों की एक ऐसी सूक्तिमय रचना रची, जिसमें इतिहास, स्वाभिमान और राष्ट्रधर्म की गूंज थी। उन सोरठों में उन्होंने लिखा, जो राजा विदेशी दरबार में स्वाभिमान गिरवी रखे, वह सिंहासन का अधिकारी नहीं। कहा जाता है कि जब महाराणा फतेहसिंह ने उन पंक्तियों को पढ़ा तो उनके कदम आगे बढ़ने से रुक गए। शेखावत ने कहा कि ठाकुर केसरी सिंह बारहठ का नाम आते ही स्वाभिमान, साहस और बलिदान अपने-आप सामने आ खड़े होते हैं। वे राजस्थान के महान क्रांतिकारी कवि, प्रखर देशभक्त और दूरदर्शी विचारक थे। यही कारण है कि इतिहास ने उन्हें सम्मानपूर्वक ‘राजस्थान केसरी’ कहा।

पूरा परिवार राष्ट्र की चरणों में हुआ समर्पित 
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि केसरी सिंह बारहठ ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने सिर्फ अपने जीवन को ही राष्ट्र के चरणों में नहीं समर्पित किया, अपितु अपने परिवार की भी क्रांति की अग्नि में आहुति दी। उनके भाई ठाकुर जोरावर सिंह बारहठ, उनके पुत्र कुंवर प्रताप सिंह बारहठ और उनके जीजा ईश्वरदान आसिया, सभी को उन्होंने निर्भीक होकर राष्ट्र-स्वाधीनता के मार्ग पर अग्रसर किया। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि हमें गुरु गोविंद सिंह के परिवार के बाद, बारहठ परिवार के अतिरिक्त कहीं और देखने को नहीं मिलता। यह साधारण त्याग नहीं था, यह राष्ट्र के लिए सर्वस्व समर्पण था।

शाहपुरा की धरती क्रांति, त्याग और राष्ट्रभक्ति की जीवंत प्रतीक 
बारहठ त्रिमूर्ति स्मारक के महत्व पर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि शाहपुरा की धरती केवल इतिहास की साक्षी नहीं है, अपितु क्रांति, त्याग और राष्ट्रभक्ति की जीवंत प्रतीक है। शाहपुरा का बारहठ त्रिमूर्ति स्मारक कोई साधारण स्मारक नहीं है। यह हमारे देश का प्रथम ऐसा स्मारक स्थल है, जिसकी स्थापना क्रांतिकारियों की पावन स्मृति में की गई। उस समय, जब देश में स्वतंत्रता संग्राम के अनेक अध्याय अभी पूरी तरह लिखे भी नहीं गए थे, शाहपुरा ने अपने वीर सपूतों को सम्मान देने की पहल कर दी थी। इसी ऐतिहासिक पहल ने पूरे देश को एक दिशा दी। इसके बाद भारत के विभिन्न भागों में क्रांतिकारियों के सम्मान में स्मारक बने, लेकिन यह स्मारक प्रथम होने का गौरव हमेशा शाहपुरा के नाम रहेगा। शेखावत ने कहा, यह स्थल आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि राष्ट्र अपने बलिदानियों को कभी विस्मृत नहीं करता।

देवखेड़ा एक गांव नहीं, भारत की आत्मा
केंद्रीय मंत्री शेखावत ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में संस्कृति मंत्रालय ने देवखेड़ा को ‘मेरा गांव मेरी धरोहर’ योजना में सम्मिलित किया है। प्रधानमंत्री अक्‍सर कहते हैं कि भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है और भारत की चेतना उन गांवों में बसती है, जहां राष्ट्र के लिए बलिदान हुआ हो। देवखेड़ा प्रधानमंत्री के इस कथन की सजीव प्रतिमा है। शेखावत ने कहा कि देवखेड़ा को राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना हमारा दायित्व है, ताकि यहां की बलिदानी गाथाएं विश्व तक पहुंच सकें। केंद्रीय मंत्री ने इस बात पर खुशी जाहिर की कि शिक्षा निदेशालय द्वारा यहां के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय का नाम ‘ठाकुर केसरी सिंह बारहठ राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, देवखेड़ा’ रखा गया है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय उनके अनुशासित, त्यागमय और राष्ट्रनिष्ठ जीवन के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

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