अल नीनो की चुनौती में किसानों के लिए ‘रामबाण’ बनी गहरी जुताई, कम बारिश में भी बढ़ेगी पैदावार

Edited By Kuldeep Kundara, Updated: 29 Apr, 2026 04:25 PM

deep plowing proves be panacea for farmers amidst challenge el niño

उदयपुर | राजस्थान में संभावित अल नीनो प्रभाव के चलते इस वर्ष मानसून के कमजोर, विलंबित और असमान रहने की आशंका जताई जा रही है।

उदयपुर | राजस्थान में संभावित अल नीनो प्रभाव के चलते इस वर्ष मानसून के कमजोर, विलंबित और असमान रहने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में राज्य की वर्षा आधारित कृषि के सामने चुनौती खड़ी हो गई है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इन परिस्थितियों में “गर्मी की जुताई” विशेष रूप से गहरी जुताई किसानों के लिए एक प्रभावी समाधान बनकर उभर रही है।

कृषि विशेषज्ञ प्रो. इन्द्रजीत माथुर के अनुसार अप्रैल से जून के बीच की गई गहरी जुताई खेत को मानसून से पहले इस तरह तैयार करती है कि सीमित वर्षा की स्थिति में भी मिट्टी अधिकतम नमी संचित कर सके। उनका कहना है कि अल नीनो के वर्षों में पहली बारिश को बहने से रोककर जमीन में सहेजना ही फसल की सफलता की कुंजी होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार चिज़ल प्लाउ जैसे आधुनिक उपकरणों से 9 से 18 इंच तक गहरी जुताई कर मिट्टी की कठोर परत (हार्डपैन) को तोड़ा जा सकता है। इससे वर्षा जल का अवशोषण 25 से 40 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। कृषि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मात्र 1 सेंटीमीटर अतिरिक्त नमी प्रति हेक्टेयर लगभग 1 लाख लीटर पानी के बराबर होती है, जो सूखे के समय फसल को बड़ा सहारा देती है।

गहरी जुताई का प्रभाव फसल उत्पादन पर भी स्पष्ट रूप से देखा गया है। जोधपुर स्थित केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान के अध्ययनों के मुताबिक, वर्षा आधारित क्षेत्रों में खरीफ फसलों की पैदावार में 12 से 22 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है। इसका सकारात्मक असर 2 से 3 वर्षों तक बना रहता है।

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    इसके अलावा यह तकनीक कीट एवं खरपतवार नियंत्रण में भी कारगर है। सफेद गिडार, दीमक और अन्य कीटों के लार्वा सतह पर आकर नष्ट हो जाते हैं, वहीं खरपतवार के बीज भी समाप्त होते हैं। सतह पर बचे फसल अवशेष मल्च का काम करते हैं, जिससे मिट्टी की नमी और जैविक गुणवत्ता बनी रहती है। आर्थिक दृष्टि से भी यह किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार गहरी जुताई से प्रति हेक्टेयर 8,000 से 15,000 रुपये तक अतिरिक्त आय और 2,000 से 4,000 रुपये तक की लागत बचत संभव है।

    हालांकि, छोटे और सीमांत किसानों के लिए आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता और लागत अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसे में विशेषज्ञों ने सरकार और निजी क्षेत्र के सहयोग से कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित करने, सब्सिडी और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समय रहते इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया जाए, तो यह न केवल संभावित सूखे के प्रभाव को कम करेगी, बल्कि राजस्थान की कृषि को अधिक स्थिर और सशक्त बनाने में भी अहम भूमिका निभाएगी।

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