Edited By Ishika Jain, Updated: 26 May, 2026 04:10 PM

राजस्थान के मरुस्थलीय जिले चूरू में अब चंदन की खेती को बढ़ावा देने की दिशा में नई पहल शुरू की गई है। अत्यधिक गर्म और शुष्क जलवायु वाले इस क्षेत्र में कृषि वानिकी योजना के तहत सफेद चंदन की खेती को संभावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का...
राजस्थान के मरुस्थलीय जिले चूरू में अब चंदन की खेती को बढ़ावा देने की दिशा में नई पहल शुरू की गई है। अत्यधिक गर्म और शुष्क जलवायु वाले इस क्षेत्र में कृषि वानिकी योजना के तहत सफेद चंदन की खेती को संभावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहा तो किसानों की आय बढ़ने के साथ महिलाओं और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी तैयार होंगे।
सामाजिक संस्था ‘रिहाई’ ने इस दिशा में शुरुआती प्रयास शुरू करते हुए किसानों और ग्रामीण कार्यकर्ताओं को चंदन की खेती के प्रति जागरूक करना शुरू कर दिया है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार विशेष तकनीक, ड्रिप सिंचाई और होस्ट प्लांट की मदद से चूरू जैसे शुष्क क्षेत्रों में भी सफेद चंदन की खेती की जा सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चंदन की खेती को दीर्घकालिक निवेश माना जाता है। सही देखभाल और वैज्ञानिक पद्धति अपनाने पर किसान 12 से 15 वर्षों में अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।
चंदन का पौधा परजीवी प्रकृति का होता है और इसके विकास के लिए अन्य पौधों की आवश्यकता होती है, जिन्हें होस्ट प्लांट कहा जाता है। अरहर, सहजन, पपीता, लाल मेहंदी और मालवर नीम जैसे पौधे चंदन के लिए पोषण स्रोत का काम करते हैं। चूरू में पानी की सीमित उपलब्धता को देखते हुए ड्रिप सिंचाई को सबसे प्रभावी विकल्प माना जा रहा है।
‘खेत खेजड़ी तौरई अभियान’ के संयोजक एडवोकेट रामेश्वर प्रजापति ने बताया कि मरुस्थल में चंदन की खेती की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इसके लिए वैज्ञानिक तरीके और विशेष निगरानी जरूरी होगी। उन्होंने कहा कि भूमि और पानी की गुणवत्ता की जांच के बाद मरुभूमि क्षेत्र में सफेद चंदन के पौधे सफलतापूर्वक लगाए जा सकते हैं।
रिहाई संस्थान के प्रतिनिधियों के अनुसार एक एकड़ भूमि में करीब 400 से 500 चंदन के पौधे लगाए जा सकते हैं। परियोजना को रिहाई संस्था और इनोवेशन इंडिया ट्रस्ट के संयुक्त सहयोग से आगे बढ़ाया जाएगा, जिसमें सरकार से मान्यता प्राप्त नर्सरियों और किसानों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
इसके अलावा किसानों को वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एनटीएमएस पोर्टल पर पंजीयन प्रक्रिया की जानकारी भी दी जा रही है। संस्था की ओर से विभिन्न ब्लॉकों के फील्ड एग्जीक्यूटिव और कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देकर इस खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है।