ABVP स्थापना दिवस विशेष: राष्ट्र-जागरण की शाश्वत ज्योति | वासुदेव देवनानी

Edited By Kuldeep Kundara, Updated: 14 Jul, 2026 02:09 PM

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स्थापना दिवस पर वासुदेव देवनानी का विशेष लेख। जानिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की स्थापना, राष्ट्र निर्माण, छात्र आंदोलन, शिक्षा सुधार, राष्ट्रीय एकता और सेवा कार्यों की प्रेरक यात्रा।

जयपुर | वर्ष 1949 में भारतीय इतिहास की उस पावन घड़ी में, जब स्वतंत्रता की नवोदित किरणें राष्ट्र-निर्माण के स्वप्न को आकार दे रही थीं, 9 जुलाई 1949 अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी ) का उदय हुआ। स्वामी विवेकानंद के चिरंतन आदर्शों ज्ञान, शील एवं एकता से प्रेरित यह महान छात्र संगठन आज विश्व के सबसे विशाल एवं प्रभावशाली विद्यार्थी मंच के रूप में प्रतिष्ठित है। राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस के इस पावन अवसर पर मैं उन महान आत्माओं को शत-शत नमन करता हूं जिन्होंने स्वामी विवेकानंद के आदर्शों ज्ञान, शील और एकता को अपने जीवन का मार्गदर्शक बनाया।

राष्ट्रभाव के संस्कारों से मिली जीवन को दिशा
मेरा अपना जीवन भी इसी पावन धारा से जुड़ा है। युवावस्था से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रेरणा-क्षेत्र में दीक्षित होकर मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से गहराई से जुड़ा। राजस्थान में  एबीवीपी के प्रदेश मंत्री, प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष पद की नौ वर्षों की जिम्मेदारी निभाना मेरे लिए साधना का काल रहा। उन दिनों महाविद्यालय के परिसरों में हम न केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता एवं छात्र-कल्याण के लिए संघर्ष करते थे, अपितु सांस्कृतिक स्वाभिमान, राष्ट्रीय एकता तथा चरित्र-निर्माण के महान लक्ष्य को भी साकार करने का प्रयास करते थे। । एबीवीपी ने हमें यह गहरा बोध कराया कि सच्ची विद्यार्थी सेवा, संकीर्ण स्वार्थ-साधना से नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का एक पवित्र यज्ञ मानकर होती है। जिसमें आहूति देना ही पवित्र कार्य है। आज विश्व का सबसे बडा छात्र संगठन एबीवीपी संपूर्ण राष्ट्र में अपनी कर्मठता, सेवा और राष्ट्रीय स्वाभिमान की संस्कृति को छात्र जीवन में अनुप्राणित कर रहा है।

देह लेकर आए, ध्येय परिषद ने दिया
देह लेकर आए, ध्येय परिषद ने दिया । यह पंक्ति, एबीवीपी के कार्यकर्ताओं के जीवन का सार है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकाल में मेरे अंतर्मन में ईश्वरीय अनुशासन, समर्पण और राष्ट्र-प्रथम की भावना थी उसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने और अधिक परिष्कृत, दृढ़ एवं क्रियाशील बनाया। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में हमारे युवाओं का दायित्व है कि वे प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विज्ञान को जोड़कर भारत को विश्व गुरु बनाने में अपना योगदान दें।

शैक्षणिक सुधार और शैक्षणिक अधिकारों का हिमायती संगठन
विश्व के सबसे बड़े छात्र संगठन एबीवीपी ने छात्र-छात्राओं की समस्याओं जैसी फीस वृद्धि, परीक्षाओं में पारदर्शिता और शिक्षा के व्यावसायीकरण के खिलाफ आवाज़ बुलन्द करते हुए शिक्षा की सर्वसुलभता और उत्तम गुणवत्ता की हिमायत की है, साथ ही महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयी परिसरों में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के खिलाफ वैचारिक संघर्ष और भारत माता की जय और वन्दे मातरम जैसे नारों को प्रमुखता दी है।

सामाजिक कार्य और पर्यावरण संरक्षण
संगठन ने सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाते हुए देशभर में विशाल स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चलाया। 1999 में एबीवीपी की स्वर्ण जयंती पर औषधीय पौधों सहित 1.5 लाख पौधे लगाए। इसके अलावा एबीवीपी ने स्टूडेंन्ट्स फार डवलपमेंट (एस.एफ.डी) जैसी विशेष पहल करते हुए छात्रों के बीच समग्र और सतत विकास की अवधारणा को दृढ़ता प्रदान की। 1975 में लगे राष्ट्रीय आपातकाल के विरोध में एबीवीपी ने लोकतन्त्र की रक्षा के लिए राष्ट्रव्यापी संघर्ष किया। इसके साथ ही मिशन पूर्वोत्तर और सीमादर्शन जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से देश के सुदूर क्षेत्रों के छात्रों को मुख्य धारा से जोड़ने और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का कार्य किया।11 सितम्बर 1990 एबीवीपी के 10 हजार कार्यकर्ता कश्मीर बचाओ आंदोलन के तहत् तिरंगा फहराने हेतु कश्मीर में श्रीनगर के लाल चौक में पहुंचे, तिरंगा फहराया और अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाने की मांग की। असम में घुसपैठ के मामले में एबीवीपी ने असम बचाओ, देश बचाओ का नारा दिया और 2 अक्टूबर 1983 को गुवाहाटी के जजेस फील्ड पर बडा प्रदर्शन किया।

बांग्लादेशी घुसपैठ के विरोध में एबीवीपी ने चिकन नेक (किशनगंज, बिहार) आंदोलन चलाया और बांग्लादेशी घुसपैठ का पर्दाफाश किया।इस प्रकार यह स्पष्ट है कि एबीवीपी महज एक छात्र संगठन ही नहीं है बल्कि राष्ट्र रक्षा, स्वाभिमान, राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रवाद और विदेशी घुसपैठ के खिलाफ भारत के युवाओं का एक राष्ट्रीय संगठन है, जिसका प्रभाव अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर है।

अल्प बीज से विशाल वटवृक्ष तक की यात्रा
इतिहास साक्षी है कि जब-जब भारत पर संकट आया, तब-तब इस देश की युवा शक्ति ने राष्ट्र की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित किया। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में लगभग अस्सी वर्ष की आयु में भी अमर सेनानी बाबू वीर कुंवर सिंह ने जिस अदम्य साहस के साथ अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी, वह आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। बिहार से लेकर आजमगढ़ तक अंग्रेजी सेना को पीछे हटने पर विवश करने वाले इस महान योद्धा ने यह सिद्ध किया कि राष्ट्रभक्ति आयु की नहीं, संकल्प की शक्ति होती है। इसी प्रकार लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान कर युवाओं को सामाजिक परिवर्तन का नेतृत्व सौंपा। राजस्थान सहित समग्र भारत में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने ने शिक्षा-क्रांति, योग्यता-आधारित सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन तथा सामाजिक सद्भाव जैसे बहुआयामी क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप अंकित की है। यह संगठन बार-बार सिद्ध करता है कि जब विद्यार्थी शक्ति अनुशासन, दूरदृष्टि, त्याग एवं सेवा-भावना से संचालित होती है, तो वह सामाजिक परिवर्तन तथा राष्ट्र-उत्थान की सबसे प्रबल एवं अजेय शक्ति सिद्ध होती है।

देश विरोधी और विघटनकारी सोच के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का मूल दर्शन राष्ट्रवाद है। यहाँ राष्ट्रवाद किसी राजनीतिक नारे का विषय नहीं है यह भारत की हजारों वर्षों पुरानी संस्कृति का विस्तार है। यह वही राष्ट्रवाद है जिसने विविधताओं से भरे भारत को एकता के सूत्र में बाँधकर रखा है। जब समाज को जाति, क्षेत्र, भाषा, संप्रदाय या अलगाववादी विचारों के आधार पर बाँटने का प्रयास होता है, तब राष्ट्रीय एकता को चुनौती मिलती है। ऐसे समय में छात्र समाज की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का विश्वास है कि भारत की एकता और अखंडता सर्वोपरि है। इसलिए परिषद विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में ऐसी प्रत्येक विचारधारा का लोकतांत्रिक, संवैधानिक और वैचारिक प्रतिरोध करने का आह्वान करती है जो राष्ट्र की एकता को कमजोर करने, हिंसा को बढ़ावा देने या समाज में वैमनस्य उत्पन्न करने का प्रयास करती हो। परिषद मानती है कि किसी भी विचार का उत्तर तर्क, संवाद, अध्ययन और लोकतांत्रिक विमर्श से दिया जाना चाहिए। यही स्वस्थ छात्र जीवन की पहचान है।

यदि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सात दशक से अधिक लंबे इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन किया जाए, तो एक तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण रूप से सामने आता है भारत में शायद ही कोई ऐसा छात्र संगठन रहा हो जिसने स्वयं को केवल छात्रसंघ चुनावों या विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित रखा हो। विद्यार्थी परिषद ने शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमांत क्षेत्रों में जनजागरण, प्राकृतिक आपदाओं में राहत, पर्यावरण संरक्षण, रक्तदान, सामाजिक समरसता, अनुसंधान, नवाचार, खेल, संस्कृति तथा राष्ट्रीय एकात्मता जैसे विविध क्षेत्रों में छात्र शक्ति को संगठित करने का सतत प्रयास किया। यही कारण है कि परिषद की पहचान एक ऐसे छात्र आंदोलन के रूप में स्थापित हुई, जिसने सामाजिक उत्तरदायित्व को अपने कार्य का अभिन्न अंग बनाया।इतिहास की एक और उल्लेखनीय विशेषता यह है कि परिषद से जुड़े असंख्य कार्यकर्ताओं ने आगे चलकर शिक्षा, विज्ञान, न्यायपालिका, सेना, प्रशासन, सामाजिक सेवा, पत्रकारिता, उद्योग, राजनीति और सार्वजनिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया, फिर भी संगठन ने स्वयं को कभी किसी एक पेशे, वर्ग या विमर्श तक सीमित नहीं होने दिया। उसकी मूल साधना सदैव व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की रही है। 

संभवतः यही कारण है कि 1949 में रोपित किया गया यह विचार-बीज आज लाखों युवाओं के चरित्र, नेतृत्व, सेवा और राष्ट्रीय भावना की छांया प्रदान करने वाले एक विशाल वटवृक्ष के रूप में विकसित दिखाई देता है। किसी भी संगठन की वास्तविक सफलता उसके भवनों, पदों या नारों से नहीं, बल्कि उन पीढ़ियों से मापी जाती है जिनके जीवन को उसने उद्देश्य, दिशा और राष्ट्रीय दृष्टि प्रदान की हो। इसी कसौटी पर देखें तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का इतिहास केवल एक संगठन का इतिहास नहीं, स्वतंत्र भारत में छात्र शक्ति के माध्यम से राष्ट्रीय पुनर्जागरण की एक निरंतर प्रवाहित होती हुई प्रेरक गाथा है।
 

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