Edited By Anil Jangid, Updated: 11 Apr, 2026 04:35 PM

नई दिल्ली/राजस्थान। राजस्थान के छह युवाओं के रूस-यूक्रेन युद्ध में फंसे होने का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। आरोप है कि रोजगार, शिक्षा और पर्यटन के नाम पर विदेश भेजे गए इन युवाओं को कथित रूप से रूस में सैन्य गतिविधियों में झोंक...
नई दिल्ली/राजस्थान। राजस्थान के छह युवाओं के रूस-यूक्रेन युद्ध में फंसे होने का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। आरोप है कि रोजगार, शिक्षा और पर्यटन के नाम पर विदेश भेजे गए इन युवाओं को कथित रूप से रूस में सैन्य गतिविधियों में झोंक दिया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय को नोटिस जारी कर स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इस मामले को राष्ट्रीय महत्व का विषय मानते हुए अगली सुनवाई 24 अप्रैल को निर्धारित की है। इस घटनाक्रम के बाद परिजनों की उम्मीदें अदालत के फैसले पर टिकी हैं। उनका कहना है कि इस पूरे मामले में शामिल एजेंटों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, जिन्होंने युवाओं को झूठे वादों के जरिए विदेश भेजा।
याचिका में जिन युवाओं के नाम शामिल हैं उनमें सुरेन्द्र दहिया (कुचामन सिटी), महावीर प्रसाद रणवां (कुचामन सिटी), संदीप सुण्डा (सीकर), गोकुल सिंह (ब्यावर), मनोज शेखावत (झोटवाड़ा) और अजय गोदारा (बीकानेर) शामिल हैं। परिजनों का आरोप है कि एजेंटों ने बेहतर रोजगार और सुरक्षित भविष्य का लालच देकर उन्हें वैध वीजा पर रूस भेजा, लेकिन वहां पहुंचते ही हालात पूरी तरह बदल गए।
परिजनों का कहना है कि रूस पहुंचने के बाद इन युवाओं के पासपोर्ट और पहचान पत्र जब्त कर लिए गए। इसके बाद उनकी आवाजाही पर रोक लगा दी गई और उन्हें मानसिक दबाव तथा धमकियों का सामना करना पड़ा। कई मामलों में उनसे ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए, जिन्हें वे समझ भी नहीं सकते थे। इसके बाद कथित रूप से उन्हें रूसी सैन्य ढांचे से जोड़ दिया गया।
परिवारों ने बताया कि सितंबर 2025 के आसपास इन युवाओं से अंतिम बार संपर्क हुआ था, जब उन्होंने बताया था कि उन्हें रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों जैसे कुप्यांस्क, सेलिडोव, माकीवका और चेल्याबिंस्क में तैनात किया गया है। इसके बाद से अब तक कोई संपर्क नहीं हो पाया है और उनकी स्थिति अज्ञात बनी हुई है।
परिजनों ने विदेश मंत्रालय, भारतीय दूतावास और राज्य प्रशासन से लगातार मदद की गुहार लगाई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। वकीलों द्वारा दायर याचिका में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप की मांग की गई है, जिसमें नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही गई है।
स्थानीय स्तर पर भी परिजनों को राहत नहीं मिली है। पुलिस में शिकायत के बावजूद अब तक मामला दर्ज नहीं होने से परिवारों में निराशा गहराती जा रही है। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं।