50 साल की हरित तपस्या: 2.5 करोड़ पेड़ लगाकर बदली धरती की तस्वीर, ‘पीपल की छांव’ में साझा किए अनुभव

Edited By Sourabh Dubey, Updated: 25 May, 2026 05:09 PM

50 years of green penance peepal baba plants 2 5 crore trees shares experiences

पर्यावरण संरक्षण को जीवन का मिशन बनाकर काम करने वाले पीपल बाबा उर्फ स्वामी प्रेम परिवर्तन ने पिछले करीब पांच दशकों में देशभर में हरियाली की नई मिसाल कायम की है। उन्होंने 2.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वनस्पति को पुनर्स्थापित करते हुए ढाई करोड़ से...

जयपुर। पर्यावरण संरक्षण को जीवन का मिशन बनाकर काम करने वाले पीपल बाबा उर्फ स्वामी प्रेम परिवर्तन ने पिछले करीब पांच दशकों में देशभर में हरियाली की नई मिसाल कायम की है। उन्होंने 2.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वनस्पति को पुनर्स्थापित करते हुए ढाई करोड़ से अधिक पेड़ लगाए हैं। अब उन्होंने अपने लंबे संघर्ष, अनुभव और प्रकृति से जुड़ी यात्रा को किताब ‘पीपल की छांव’ के जरिए लोगों तक पहुंचाया है। राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में उन्होंने पौधरोपण अभियान चलाकर पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दिया। राजस्थान के जयपुर, उदयपुर, बड़गांव और जोधपुर में ही करीब साढ़े सात लाख पौधे लगाए गए। पुस्तक में उन्होंने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अनुभवों के साथ पेड़ों और इंसान के रिश्ते को विस्तार से बताया है।

अलग-अलग क्षेत्रों में लगाए स्थानीय प्रजातियों के पौधे 

स्वामी प्रेम परिवर्तन ने बताया कि उन्होंने अलग-अलग राज्यों की जलवायु और लोगों की जरूरतों के अनुसार पौधों का चयन किया। मराठवाड़ा क्षेत्र में बड़ी संख्या में नीम के पेड़ लगाए गए, जबकि राजस्थान और गुजरात में अरावली क्षेत्र की कठोर प्रजातियों को प्राथमिकता दी गई। इनमें लसोड़ा, चामरोड़, बहेड़ा, निर्गुंडी, वज्रदंती, मेहंदी और करौंदा जैसी प्रजातियां शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि पेड़ों की छांव केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह लोगों को आर्थिक सहारा भी देती है। सड़क किनारे काम करने वाले छोटे विक्रेताओं के लिए छायादार पेड़ बड़ी राहत बनते हैं, जिससे उन्हें रोजाना किराया खर्च नहीं करना पड़ता। 

पीपल के पेड़ के औषधीय महत्व का भी जिक्र

पुस्तक में पीपल के पेड़ के महत्व और उससे जुड़े अनुभवों को भी शामिल किया गया है। स्वामी प्रेम परिवर्तन ने बताया कि पीपल के पत्तों की अपनी अलग खुशबू होती है। आयुर्वेद में इसके पत्तों के पाउडर का उपयोग अस्थमा में और काढ़े का उपयोग हृदय रोगों में किया जाता है।

कोरोना काल में भी जारी रहा पौधों की देखभाल का काम

उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी के दौरान भी उनकी टीम पौधों की देखभाल और सिंचाई में लगातार जुटी रही। पौधे लगाने के साथ उनकी सुरक्षा और नियमित देखभाल को भी अभियान का अहम हिस्सा बनाया गया।

बचपन से प्रकृति के बीच बीता जीवन

स्वामी प्रेम परिवर्तन ने बताया कि बचपन में नानी के साथ रहते हुए उन्हें उत्तराखंड के जंगलों और प्राकृतिक क्षेत्रों को करीब से देखने का अवसर मिला। कॉर्बेट, राजाजी, हरिद्वार, ऋषिकेश, नरेंद्र नगर, टिहरी, उत्तरकाशी, नैनीताल और अल्मोड़ा जैसे क्षेत्रों ने उनके मन में प्रकृति के प्रति गहरा जुड़ाव पैदा किया। बाद में परिवार के हिमाचल प्रदेश के डलहौजी स्थानांतरित होने पर उनकी पढ़ाई कैंब्रियन हॉल स्कूल से शुरू हुई।

‘पीपल की छांव’ में दर्ज हैं जीवन के अनुभव

अपने पर्यावरणीय सफर और अनुभवों को उन्होंने ‘पीपल की छांव’ पुस्तक में संजोया है। यह पुस्तक पेंग्विन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही है और अमेजन समेत विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी। पुस्तक के माध्यम से उन्होंने प्रकृति संरक्षण, पेड़ों के महत्व और आम लोगों की भूमिका को प्रमुखता से सामने रखा है।

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