Edited By Payal Choudhary, Updated: 26 Feb, 2026 07:13 PM
राजस्थान में चर्चित जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने बड़ी राहत देते हुए श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी के संचालक पदमचंद जैन के बेटे पीयूष जैन, गणपति ट्यूबवेल कंपनी के मालिक महेश मित्तल और उनके बेटे हेमंत मित्तल सहित कुल पांच...
राजस्थान में चर्चित जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने बड़ी राहत देते हुए श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी के संचालक पदमचंद जैन के बेटे पीयूष जैन, गणपति ट्यूबवेल कंपनी के मालिक महेश मित्तल और उनके बेटे हेमंत मित्तल सहित कुल पांच आरोपियों को जमानत दे दी है। सभी आरोपियों को एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने दिसंबर 2025 में गिरफ्तार किया था।
इस फैसले के बाद एक बार फिर जल जीवन मिशन में कथित अनियमितताओं और जांच प्रक्रिया को लेकर बहस तेज हो गई है। अदालत में आरोपियों की ओर से कई महत्वपूर्ण दलीलें पेश की गईं, जिनके आधार पर हाईकोर्ट ने जमानत मंजूर की।
2023 में दर्ज हुई थी FIR, 2025 में हुई गिरफ्तारी
बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि एसीबी ने इस मामले में वर्ष 2023 में एफआईआर दर्ज की थी। उस समय जांच लंबित रखी गई और आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। लेकिन करीब दो साल बाद, दिसंबर 2025 में अचानक गिरफ्तारी की कार्रवाई कर दी गई।
आरोपियों की ओर से यह भी कहा गया कि एसीबी के पास गिरफ्तारी के समय कोई नया साक्ष्य (एविडेंस) मौजूद नहीं था। ऐसे में लंबे समय बाद की गई गिरफ्तारी को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सरकारी अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति नहीं
वरिष्ठ अधिवक्ता ब्रह्मानंद सांदू ने अदालत में दलील देते हुए कहा कि जिन सरकारी अधिकारियों पर रिश्वत लेने के आरोप लगाए गए हैं, उनकी गिरफ्तारी के बाद से अब तक सरकार की ओर से अभियोजन स्वीकृति जारी नहीं की गई है।
बचाव पक्ष का तर्क था कि जब तक संबंधित सरकारी अधिकारियों के खिलाफ विधिवत अभियोजन स्वीकृति नहीं मिलती, तब तक पूरे मामले की कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं मानी जा सकती। ऐसे में निजी कंपनियों से जुड़े आरोपियों को लंबे समय तक जेल में रखना न्यायसंगत नहीं है।
चालान पेश, अधिकतम सजा 7 साल
अदालत को यह भी बताया गया कि आरोपियों के खिलाफ चालान पहले ही पेश किया जा चुका है। जिन धाराओं में आरोप तय किए गए हैं, उनमें अधिकतम सजा सात साल तक का प्रावधान है।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि इस तरह के मामलों में ट्रायल की प्रक्रिया लंबी चलती है। यदि आरोपियों को जमानत नहीं दी जाती तो उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ सकता है, जबकि दोष सिद्ध होना अभी बाकी है। भारतीय न्याय प्रणाली में ‘बेल इज द रूल, जेल इज द एक्सेप्शन’ के सिद्धांत का हवाला देते हुए जमानत की मांग की गई।
पीयूष जैन के खिलाफ स्पष्ट आरोप नहीं
पीयूष जैन की ओर से विशेष रूप से यह तर्क रखा गया कि उनके खिलाफ कोई स्पष्ट और प्रत्यक्ष आरोप नहीं है। एसीबी का दावा है कि पदमचंद जैन और पीयूष जैन के बीच हुई बातचीत में भ्रष्टाचार की पुष्टि होती है।
हालांकि बचाव पक्ष का कहना था कि पूरी बातचीत में कहीं भी पैसों के लेन-देन का जिक्र नहीं है। न तो किसी प्रकार की रिश्वत की रकम बरामद हुई है और न ही पीयूष जैन से कोई रिकवरी की गई है। ऐसे में मात्र बातचीत के आधार पर गंभीर आरोप लगाना उचित नहीं है।
जांच और कार्रवाई पर उठे सवाल
इस मामले में हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद एसीबी की कार्रवाई और जांच की समय-सीमा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। विपक्ष पहले से ही जल जीवन मिशन में बड़े स्तर पर अनियमितताओं का आरोप लगाता रहा है।
जल जीवन मिशन, जो ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर नल से जल पहुंचाने की महत्वाकांक्षी योजना है, उसमें कथित भ्रष्टाचार के आरोपों ने राज्य की राजनीति में भी हलचल पैदा की है। हालांकि एसीबी की ओर से इस मामले में जांच जारी रहने की बात कही गई है।
आगे क्या?
जमानत मिलने का मतलब यह नहीं है कि आरोप खत्म हो गए हैं। अदालत में अब इस मामले का ट्रायल चलेगा और साक्ष्यों के आधार पर अंतिम निर्णय होगा।
फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश से आरोपियों को राहत जरूर मिली है, लेकिन जल जीवन मिशन घोटाले की जांच और कानूनी प्रक्रिया आने वाले समय में और भी कई अहम खुलासे कर सकती है।
यह मामला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक योजनाओं में पारदर्शिता के लिहाज से भी बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।