13 साल से कोमा में पड़े बेटे के लिए मां-बाप ने मांगी इच्छामृत्यु, सुप्रीम कोर्ट ने दी पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति

Edited By LUCKY SHARMA, Updated: 12 Mar, 2026 02:18 PM

harish rana passive euthanasia supreme court right to die with dignity case

गाजियाबाद के हरीश राणा 13 साल से स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में हैं। इलाज में सब कुछ गंवाने के बाद माता-पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति देते हुए “गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार” के सिद्धांत को लागू किया।

सपनों से भरी जिंदगी और एक हादसे ने सब बदल दिया

कभी जिन आंखों में बेटे के सुनहरे भविष्य के सपने थे, आज वही आंखें उसके दर्द से मुक्ति की प्रार्थना कर रही हैं। यह कहानी है गाजियाबाद के हरीश राणा की और उस परिवार की, जिसकी जिंदगी 13 साल पहले एक हादसे के बाद जैसे ठहर गई।

हरीश राणा कभी हंसते-मुस्कुराते और सपनों से भरे युवा थे। उनके माता-पिता का सपना था कि उनका बेटा एक दिन वेटलिफ्टिंग में नाम कमाए और परिवार का नाम रोशन करे। लेकिन एक दिन छत से गिरने का हादसा उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल गया। इस दुर्घटना के बाद हरीश ऐसी अवस्था में पहुंच गए जहां से वे कभी सामान्य जीवन में लौट नहीं पाए।

13 साल से अचेत अवस्था में है हरीश

हादसे के बाद से हरीश राणा पिछले 13 सालों से अचेत अवस्था में हैं। डॉक्टरों के अनुसार वे स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में हैं, यानी ऐसी स्थिति जिसमें मरीज में चेतना के कोई संकेत नहीं होते।

उनकी सांसें मेडिकल उपकरणों की मदद से चल रही हैं और शरीर को पोषण एक ट्यूब के जरिए दिया जाता है। परिवार के लिए हर दिन एक नई परीक्षा जैसा है। हरीश न बोल सकते हैं, न चल सकते हैं और न ही किसी प्रतिक्रिया के जरिए अपने आसपास की दुनिया से जुड़ पाते हैं।

इलाज की उम्मीद में पिता ने बेच दिया तीन मंजिला मकान

बेटे को ठीक करने की उम्मीद में परिवार ने हर संभव कोशिश की। माता-पिता ने कई डॉक्टरों से सलाह ली, बड़े अस्पतालों में इलाज कराया और भगवान से चमत्कार की प्रार्थना की।

इलाज के खर्च को पूरा करने के लिए पिता अशोक राणा ने अपना तीन मंजिला मकान तक बेच दिया। आज परिवार एक छोटे से फ्लैट में रह रहा है। इसके बावजूद बेटे की देखभाल और मेडिकल जरूरतों पर हर महीने हजारों रुपये खर्च हो रहे हैं। इतने लंबे समय के बाद भी हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।

सपनों से भरी जिंदगी और एक हादसे ने सब बदल दिया

कभी जिन आंखों में बेटे के सुनहरे भविष्य के सपने थे, आज वही आंखें उसके दर्द से मुक्ति की प्रार्थना कर रही हैं। यह कहानी है गाजियाबाद के हरीश राणा की और उस परिवार की, जिसकी जिंदगी 13 साल पहले एक हादसे के बाद जैसे ठहर गई।

हरीश राणा कभी हंसते-मुस्कुराते और सपनों से भरे युवा थे। उनके माता-पिता का सपना था कि उनका बेटा एक दिन वेटलिफ्टिंग में नाम कमाए और परिवार का नाम रोशन करे। लेकिन एक दिन छत से गिरने का हादसा उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल गया। इस दुर्घटना के बाद हरीश ऐसी अवस्था में पहुंच गए जहां से वे कभी सामान्य जीवन में लौट नहीं पाए।

13 साल से अचेत अवस्था में है हरीश

हादसे के बाद से हरीश राणा पिछले 13 सालों से अचेत अवस्था में हैं। डॉक्टरों के अनुसार वे स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में हैं, यानी ऐसी स्थिति जिसमें मरीज में चेतना के कोई संकेत नहीं होते।

उनकी सांसें मेडिकल उपकरणों की मदद से चल रही हैं और शरीर को पोषण एक ट्यूब के जरिए दिया जाता है। परिवार के लिए हर दिन एक नई परीक्षा जैसा है। हरीश न बोल सकते हैं, न चल सकते हैं और न ही किसी प्रतिक्रिया के जरिए अपने आसपास की दुनिया से जुड़ पाते हैं।

इलाज की उम्मीद में पिता ने बेच दिया तीन मंजिला मकान

बेटे को ठीक करने की उम्मीद में परिवार ने हर संभव कोशिश की। माता-पिता ने कई डॉक्टरों से सलाह ली, बड़े अस्पतालों में इलाज कराया और भगवान से चमत्कार की प्रार्थना की।

इलाज के खर्च को पूरा करने के लिए पिता अशोक राणा ने अपना तीन मंजिला मकान तक बेच दिया। आज परिवार एक छोटे से फ्लैट में रह रहा है। इसके बावजूद बेटे की देखभाल और मेडिकल जरूरतों पर हर महीने हजारों रुपये खर्च हो रहे हैं। इतने लंबे समय के बाद भी हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।

मां की प्रार्थना बदल गई

शुरुआत में मां हर मंदिर जाकर बेटे के ठीक होने की दुआ मांगती थी। लेकिन सालों तक बेटे को उसी हालत में देखते हुए उनकी प्रार्थना भी बदल गई।

अब वह भगवान से लंबी उम्र नहीं मांगतीं, बल्कि यही कहती हैं कि उनके बेटे को इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिल जाए। बेटे को हर दिन इस हालत में देखना उनके लिए किसी मानसिक यातना से कम नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

जब उम्मीद लगभग खत्म हो गई तो परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर बेटे के लिए इच्छामृत्यु यानी यूथेनेशिया की अनुमति मांगी।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट और डॉक्टरों की राय का अध्ययन किया। अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि हरीश पिछले 13 सालों से स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में हैं और उनके ठीक होने की संभावना बेहद कम है।

सुप्रीम कोर्ट ने दी पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि जब किसी मरीज के ठीक होने की संभावना समाप्त हो जाए और वह लंबे समय तक अचेत अवस्था में रहे, तब उसे अनावश्यक रूप से जीवन-रक्षक उपकरणों के सहारे जीवित रखना उचित नहीं है।

इसी आधार पर अदालत ने हरीश राणा के मामले में पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। इसका मतलब है कि मरीज को कृत्रिम रूप से जीवित रखने वाली मेडिकल सहायता को हटाया जा सकता है।

2018 के फैसले के सिद्धांत को मिला व्यावहारिक रूप

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में “गरिमा के साथ मरने के अधिकार” को मौलिक अधिकार का हिस्सा माना था।

अदालत ने कहा था कि जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी शामिल है। हरीश राणा का मामला उन उदाहरणों में गिना जा रहा है जहां इस सिद्धांत को वास्तविक जीवन के मामले में लागू किया गया।

दर्द से मुक्ति की कहानी

फैसले के बाद पिता अशोक राणा की आंखों में आंसू थे। उन्होंने कहा कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चे के लिए ऐसा फैसला नहीं लेना चाहता। लेकिन जब उम्मीद खत्म हो जाए और केवल कष्ट बाकी रह जाए, तब यह फैसला मजबूरी बन जाता है।

हरीश राणा की कहानी सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उन हजारों परिवारों की कहानी है जो अपने प्रियजनों को सालों तक असहनीय पीड़ा में देखते हैं और एक दिन मजबूरी में यही प्रार्थना करते हैं — लंबी जिंदगी नहीं, बस दर्द से मुक्ति।

शुरुआत में मां हर मंदिर जाकर बेटे के ठीक होने की दुआ मांगती थी। लेकिन सालों तक बेटे को उसी हालत में देखते हुए उनकी प्रार्थना भी बदल गई।

अब वह भगवान से लंबी उम्र नहीं मांगतीं, बल्कि यही कहती हैं कि उनके बेटे को इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिल जाए। बेटे को हर दिन इस हालत में देखना उनके लिए किसी मानसिक यातना से कम नहीं है।

 

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