22 जून से वर्षाकाल का शुभारंभ, 56 दिन बरसेंगे बादल, सावन रहेगा सबसे मेहरबान

Edited By Anil Jangid, Updated: 12 Jun, 2026 07:53 PM

monsoon begins on june 22 sawan set to bring maximum showers

श्री लक्ष्मीनारायण एस्ट्रो सॉल्यूशन अजमेर की निदेशिका ज्योतिषाचार्या एवं टैरो कार्ड रीडर नीतिका शर्मा ने बताया कि प्रतिवर्ष सूर्य के आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश के समय बनाई जाने वाली विशेष कुंडली से मानसून की स्थिति का आकलन किया जाता है।

जयपुर। इस बार मानसून सामान्य रहने के संकेत हैं, लेकिन बारिश का मिजाज पूरे चार महीनों तक एक जैसा नहीं रहेगा। ज्योतिषीय गणनाओं और पंचांग के अनुसार 22 जून से शुरू होने वाले वर्षाकाल में कुल 56 दिन वर्षा के योग बन रहे हैं। इनमें सर्वाधिक 16 दिन बारिश सावन माह में होने की संभावना है। हालांकि सामान्य वर्षा के बावजूद कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति और कहीं-कहीं अतिवृष्टि की आशंका भी जताई गई है। श्री लक्ष्मीनारायण एस्ट्रो सॉल्यूशन अजमेर की निदेशिका ज्योतिषाचार्या एवं टैरो कार्ड रीडर नीतिका शर्मा ने बताया कि प्रतिवर्ष सूर्य के आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश के समय बनाई जाने वाली विशेष कुंडली से मानसून की स्थिति का आकलन किया जाता है। इस वर्ष 22 जून को दोपहर 12:26 बजे सूर्य के आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश के समय कन्या लग्न उदय होगा। लग्न में चंद्रमा की उपस्थिति वर्षा के लिए अनुकूल संकेत देती है, लेकिन शुष्क राशि और शनि की दृष्टि के कारण कुछ क्षेत्रों में बारिश का असमान वितरण देखने को मिल सकता है।

 

जून से सितंबर तक मंगल सूर्य से पीछे रहेगा, जो वर्षा के लिए शुभ योग माना जाता है। वहीं गुरु और शनि दोनों जल तत्व की राशियों में गोचर करेंगे, जिससे देश में 95 से 100 प्रतिशत तक सामान्य मानसून रहने की संभावना है। हालांकि गुरु की तेज गति और 26 जुलाई से शनि के वक्री होने के कारण अगस्त और सितंबर में कुछ स्थानों पर असामान्य वर्षा भी हो सकती है।

 

पंचांग के अनुसार आषाढ़ में 13, सावन में 16, भाद्रपद में 15 तथा आश्विन में 12 दिन वर्षा के योग बन रहे हैं। कुल 56 वर्षा दिवसों में 35 दिन उत्तम, 13 दिन मध्यम और 8 दिन मंद वर्षा के संकेत बताए गए हैं।

 

16 जुलाई से 15 अगस्त के बीच गुरु और सूर्य की युति के कारण देश के कई हिस्सों में बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है। मध्य भारत के छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा में इस अवधि में अधिक वर्षा के प्रबल योग हैं। वहीं 22 अगस्त से 17 सितंबर के बीच ग्रहों के शुष्क राशियों में प्रवेश करने से वर्षा की गतिविधियों में कमी आ सकती है।

 

यह पूर्वानुमान किसानों के लिए राहत भरा माना जा रहा है। यदि वर्षा का यह क्रम बना रहा तो बाजरा, मूंग, मोठ, ग्वार और तिल जैसी खरीफ फसलों को पर्याप्त नमी मिलेगी। सावन में सबसे अधिक वर्षा के संकेत रेगिस्तान की धरती को हरियाली की चादर ओढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

 

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (जल स्तंभ रेवती 03.63%) 
यह लगभग नगण्य है। अधिकांश क्षेत्रों में वर्षा कम होगी। खण्डवृष्टि से कृषि को हानि होगी। बिहार, उड़ीसा, आसाम, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश आदि मध्य-पूर्वी क्षेत्रों में प्रतिकूल एवं बिना मौसम की वृष्टि होगी। अनावृष्टि-अतिवृष्टि से जन-धन की हानि होगी। कई भू-भाग अकालग्रस्त घोषित होंगे। अत्यधिक जल से होने वाली खेती (चावल आदि) को क्षति होगी। भू-जल में गिरावट होगी। रोहिणी का वास समुद्र में होने से कहीं-कहीं अनुकूल व उपयोगी वर्षा होगी।

 

सूर्य का आर्द्रा प्रवेशकालिक फल (यहीं से मानसून प्रारम्भ होता है।) 
विक्रमी संवत् 2083 में सूर्य का आर्द्रा में प्रवेश 22 जून 2026 को दोपहर 12:25 पर हस्त नक्षत्र, वरियान योग, कन्या राशि के चन्द्रमा में तथा कन्यालग्न में होगा। द्विस्वभाव राशि, पृथ्वीतत्त्व कारक तथा दक्षिण दिशा की स्वामी कन्या लग्न में सूर्य का आर्द्रा में प्रवेश हुआ है। लग्नेश बुध (पृथ्वीतत्त्व कारक ग्रह) वायुतत्व राशि मिथुन में स्थित है। जलतत्त्व कारक ग्रह चन्द्रमा लग्नभाव में ही स्थित है, जिससे दक्षिणी भारत में समयानुसार मानसून प्रारम्भ हो जाएगा तथा वर्षा भी पर्याप्त होगी। स्थिरसंज्ञक तथा वायुकारक ग्रह शनि की दृष्टि के कारण मेघों की चाल में व्यवधान के कारण उपयोगी वर्षा की कमी रहेगी। जलीय ग्रह (शुक्र) जलतत्त्व राशि तथा उत्तर दिशा की स्वामी कर्क राशि में गुरु (स्थिरसंज्ञक) के साथ है। जलस्तम्भ भी नगण्य (03.63%) है, जिससे विपरीत परिस्थितियों तथा धीमे वायु-वेग के बावजूद पूर्वी एवं दक्षिणी क्षेत्रों में व्यापक वर्षा होगी। उत्तरी राज्यों (पश्चिमी उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखण्ड) में भी कुछ विशेष क्षेत्रों में अच्छी वर्षा व अन्न उत्पादन यथोचित होगा। उत्तर-पश्चिम के कुछ क्षेत्रों में वर्षा की कमी से अकाल की स्थिति बनेगी। उत्तरी राज्यों में खण्डवृष्टि के ही योग बनेंगे। मंगल-शनि के मध्य दृष्टि सम्बन्ध होने से कुछ क्षेत्रों में अग्निकाण्ड, लू तथा पश्चिमी राज्यों में अल्प वर्षा से अकाल जैसी परिस्थितियां बनेंगी। आर्द्रा प्रवेश सोमवार को होने से सुभिक्ष के संकेत हैं। अर्थात् पर्याप्त वर्षा होने से गेहूँ, अन्न आदि का उत्पादन अच्छा होगा तथा मूल्यों में विशेष अधिक वृद्धि नहीं होगी। 
शशिधरवारे स्मरहरधिष्ण्ये। दिनकरवेशे सतिहिसुभिक्षम् ।।

 

हस्त-नक्षत्र में आर्द्रा-प्रवेश होने से धन-धान्य एवं वस्त्रादि की वृद्धि होगी। सम्पन्नता बढ़ेगी, परन्तु वरियान योग होने से फल, कन्द-मूल आदि महँगे होंगे। दोपहर के समय आर्द्रा-प्रवेश होने से खड़ी फसलों को नुकसान, धान्य, चावल, चना आदि अनाज मंहगे होंगे तथा तृण, घास आदि कृषि का अज्ञात बीमारी के कारण नाश हो सकात है। 
मध्याह्नकाले कृषिनाशनाय धान्यं महर्घ च तृणस्य नाशः ।।

 

चार महीनों का वर्षा गणित
आषाढ़ : 13 दिन
सावन : 16 दिन
भाद्रपद : 15 दिन
आश्विन : 12 दिन
कुल वर्षा दिवस : 56
उत्तम वर्षा : 35 दिन
मध्यम वर्षा : 13 दिन
मंद वर्षा : 8 दिन

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