पूरे नौ दिनों की होगी चैत्र नवरात्रि, 19 मार्च को उत्तराभाद्रपद नक्षत्र और शुक्ल योग में शुरु होगी चैत्र नवरात्रि

Edited By Anil Jangid, Updated: 18 Mar, 2026 12:09 PM

chaitra navratri to last for nine days begins on march 19 uttara bhadrapada

पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6:52 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 20 मार्च की सुबह 4:52 मिनट पर होगा।

इस साल चैत्र नवरात्रि व नव संवत्सर 19 मार्च से शुरू होगा। वहीं नवरात्रि का समापन 27 मार्च को होगा। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा की पूजा-उपासना बड़ी ही श्रद्धा के साथ की जाती है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6:52 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 20 मार्च की सुबह 4:52 मिनट पर होगा। इसलिए इस वर्ष चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च को घटस्थापना के साथ होगी। इस दिन गुड़ी पड़वा के साथ हिंदू नववर्ष मनाया जाएगा। वहीं नवरात्रि का समापन 27 मार्च को होगा। चैत्र नवरात्रि प्रतिपदा तिथि से ही नया हिंदू वर्ष प्रारंभ हो जाता है। इस बार नवरात्रि पूरे नौ दिनों के होंगे और रामनवमी 26 मार्च को मनाई जाएगी।

 

चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथे दिन मां कूष्मांडा, पांचवें दिन मां स्कंदमाता, छठे दिन मां कात्यायनी, सातवें दिन मां कालरात्रि, आठवें दिन मां महागौरी और नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। प्रत्येक स्वरूप का अपना विशेष महत्व है और भक्त इनकी पूजा करके अलग-अलग प्रकार के आशीर्वाद की कामना करते हैं। नवरात्रि के अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। इस दिन छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है और उन्हें भोजन तथा उपहार दिए जाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

 

घट् स्थापना का मुहूर्त
बसंत नवरात्रा का आरंभ चैत्र शुक्ल में उदय व्यापिनी प्रतिपदा को होता है। लेकिन यदि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा किसी भी दिन उदय व्यापिनी नहीं हो (अर्थात् प्रतिपदा तिथि क्षय हो) तो पहले दिन (अमावस्या वाले दिन ही) नवरात्रा प्रारंभ करने के शास्त्रों में निर्देश मिलते हैं। 
"तत्रीवयिकी प्रतिपद् ग्राह्या । दिनद्विये उदयव्याप्ती अव्याप्ती वा पूर्वा ।।" (धर्मसिंधु) ।

 

इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का क्षय है, अर्थात् प्रतिपदा 19 मार्च, 2026 गुरुवार को सूर्योदय बाद शुरु होकर इसी दिन गुरुवार को ही (अग्रिम दिन शुक्रवार के सूर्योदय के पहले) समाप्त हो रही है, जिससे वह दोनों दिन (19 व 20 मार्च को) उदय व्यापिनी नहीं बनी है। बसन्त नवरात्र का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल में उदयव्यापिनी प्रतिपदा में द्विस्वभावलग्र युक्त प्रातः काल में होता है। इस वर्ष चैत्रशुक्ल प्रतिपदा, 19 मार्च 2026 (गुरुवार) को प्रातः 06:54 से अंतरात्रि 04:52 तक है। शास्त्रानुसार बसन्तनवरात्र का प्रारम्भ व घटस्थापना इसी दिन होगी। 
द्विस्वभाव मीनलग्न प्रातः 06:54 से प्रातः 07:50 तक 
मिथुनलग्न प्रातः 11:24 से दोपहर 01:38 तक 
शुभ चौघड़िया प्रातः 06:54 से प्रातः 08:05, 
चर-लाभ-अमृत का चौघड़िया प्रातः वकः 84 से दोपहर 03:32 तक 
अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:11 से 12:59 तक रहेगा।

 

तिथि 
हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6:52 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 20 मार्च की सुबह 4:52 मिनट पर होगा। इसलिए इस वर्ष चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च को घटस्थापना के साथ होगी। उदया तिथि के अनुसार इस साल चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू होगी और इसका समापन 27 मार्च को होगा। चैत्र नवरात्रि प्रतिपदा तिथि से ही नया हिंदू वर्ष प्रारंभ हो जाता है।

 

नक्षत्र एवं शुभ योग
नवरात्रि के पहले दिन उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, शुक्ल योग का  संयोग भी रहेगा। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना और घटस्थापना की जाती है। 

 

विक्रम संवत 2083
हिंदू परंपरा में नव संवत्सर को नए आरंभ, नई ऊर्जा और नए संकल्प का प्रतीक माना जाता है। हर साल की तरह इस बार भी नया संवत्सर अपने साथ नई संभावनाएं और कुछ चुनौतियां लेकर आएगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार विक्रम संवत 2083 का नाम ‘रौद्र’ संवत्सर है, जिसका प्रभाव साल भर देखने को मिलेगा। इस साल चैत्र नवरात्र कुछ खास ज्योतिषीय संयोग में शुरू होंगे। प्रतिपदा तिथि अमावस्या में मिलने के कारण पहली तिथि टूटने का योग बन रहा है, लेकिन इसके बावजूद नवरात्र पूरे नौ दिनों के ही रहेंगे। प्रतिपदा तिथि 19 को सूर्योदय के बाद प्रारंभ होगी और अगले दिन 20 मार्च को सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगी। शास्त्रों के अनुसार जिस दिन प्रतिपदा तिथि होती है, उसी दिन नवरात्र घटस्थापना करना श्रेष्ठ माना गया है।

 

पालकी पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा
हर बार नवरात्र में देवी अलग-अलग वाहन पर आती हैं, और उस वाहन के हिसाब से अगले छह महीने की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है। इस बार मां दुर्गा पालकी पर सवार होकर आएंगी। देवी भागवत में पालकी में माता के आगमन का फल  "ढोलायां मरणं धुवम्"  बताया गया है जो जन हानि रक्तपात होना बताता है। अर्थात पालकी (डोली) पर माता का आगमन शुभता का संकेत नहीं है। माता का डोली पर आगमन सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल व महामारी का परिचायक माना गया है।

 

चैत्र नवरात्रि  की तिथियां
19  मार्च - नवरात्रि प्रतिपदा- मां शैलपुत्री पूजा और घटस्थापना
20  मार्च - नवरात्रि द्वितीया- मां ब्रह्मचारिणी पूजा 
21  मार्च - नवरात्रि तृतीया- मां चंद्रघंटा पूजा
22  मार्च - नवरात्रि चतुर्थी- मां कुष्मांडा पूजा
23  मार्च - नवरात्रि पंचमी- मां स्कंदमाता पूजा
24  मार्च - नवरात्रि षष्ठी- मां कात्यायनी पूजा
25  मार्च - नवरात्रि सप्तमी- मां कालरात्रि पूजा
26  मार्च - नवरात्रि अष्टमी- मां महागौरी, रामनवमी
27  मार्च - नवरात्रि नवमी- मां सिद्धिदात्री , नवरात्रि पारण

 

कलश स्थापना की सामग्री
मां दुर्गा को लाल रंग खास पसंद है इसलिए लाल रंग का ही आसन खरीदें। इसके अलावा कलश स्थापना के लिए मिट्टी का पात्र, जौ, मिट्टी, जल से भरा हुआ कलश, मौली, इलायची, लौंग, कपूर, रोली, साबुत सुपारी, साबुत चावल, सिक्के, अशोक या आम के पांच पत्ते, नारियल, चुनरी, सिंदूर, फल-फूल, फूलों की माला और श्रृंगार पिटारी भी चाहिए।

 

कलश स्थापना
नवरात्रि के पहले दिन यानी कि प्रतिपदा को सुबह स्नान कर लें। मंदिर की साफ-सफाई करने के बाद सबसे पहले गणेश जी का नाम लें और फिर मां दुर्गा के नाम से अखंड ज्योत जलाएं। कलश स्थापना के लिए मिट्टी के पात्र में मिट्टी डालकर उसमें जौ के बीज बोएं। अब एक तांबे के लोटे पर रोली से स्वास्तिक बनाएं। लोटे के ऊपरी हिस्से में मौली बांधें। अब इस लोटे में पानी भरकर उसमें कुछ बूंदें गंगाजल की मिलाएं। फिर उसमें सवा रुपया, दूब, सुपारी, इत्र और अक्षत डालें। इसके बाद कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते लगाएं। अब एक नारियल को लाल कपड़े से लपेटकर उसे मौली से बांध दें। फिर नारियल को कलश के ऊपर रख दें। अब इस कलश को मिट्टी के उस पात्र के ठीक बीचों बीच रख दें जिसमें आपने जौ बोएं हैं। कलश स्थापना के साथ ही नवरात्रि के नौ व्रतों को रखने का संकल्प लिया जाता है। आप चाहें तो कलश स्थापना के साथ ही माता के नाम की अखंड ज्योति भी जला सकते हैं।

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