800 साल पुरानी परंपरा जीवंत: बूंदी के बरूंधन गांव में हाड़ा वंशजों और ग्रामीणों के बीच ‘दड़ा खेल’ का महामुकाबला

Edited By Anil Jangid, Updated: 15 Jan, 2026 04:36 PM

800 year old dada game revives cultural heritage in bundi s barundhan village

बूंदी। राजस्थान के बूंदी जिले के बरूंधन गांव में मकर संक्रांति के अवसर पर हर वर्ष की तरह इस बार भी ऐतिहासिक दड़ा खेल महोत्सव पूरे उत्साह और परंपरागत गरिमा के साथ आयोजित हुआ। करीब 800 साल पुरानी इस अनूठी परंपरा ने एक बार फिर गांव की गलियों को जोश,...

बूंदी। राजस्थान के बूंदी जिले के बरूंधन गांव में मकर संक्रांति के अवसर पर हर वर्ष की तरह इस बार भी ऐतिहासिक दड़ा खेल महोत्सव पूरे उत्साह और परंपरागत गरिमा के साथ आयोजित हुआ। करीब 800 साल पुरानी इस अनूठी परंपरा ने एक बार फिर गांव की गलियों को जोश, साहस और एकता के रंग में रंग दिया। बुधवार को मकर संक्रांति के दिन खुले चैलेंज के रूप में खेले गए इस दड़ा खेल को देखने के लिए आसपास के करीब 15 गांवों से लोग उमड़ पड़े।

50 किलो का दड़ा बना आकर्षण का केंद्र

दड़ा खेल का मुख्य आकर्षण करीब 50 किलो वजनी दड़ा रहा, जो टाट, सूत और मजबूत रस्सियों से तैयार फुटबॉलनुमा गोला होता है। सुबह से ही गांव की गलियों में ढोल-नगाड़ों की गूंज सुनाई देने लगी। पूरे सम्मान और पारंपरिक गाजे-बाजे के साथ दड़े को राजपूत मोहल्ले से निकालकर मुख्य बाजार स्थित लक्ष्मीनाथ मंदिर के सामने खेल स्थल तक लाया गया। पूजा-अर्चना के बाद विधिवत रूप से खेल की शुरुआत हुई।

हाड़ा वंशज बनाम ग्रामीण, तीन घंटे चला संघर्ष

दड़ा महोत्सव में दो दल आमने-सामने थे—एक ओर हाड़ा वंशज, तो दूसरी ओर बरूंधन गांव और आसपास के ग्रामीणों का संयुक्त दल। खेल का उद्देश्य था तय की गई सीमा, जिसे स्थानीय भाषा में “बॉर्डर” कहा जाता है, तक दड़े को पहुंचाना। दड़े को अपनी सीमा तक ले जाने के लिए दोनों दलों ने पूरी ताकत झोंक दी। धक्का-मुक्की, खींचतान और गिरना-पड़ना इस खेल का हिस्सा रहा। करीब तीन घंटे तक चले इस रोमांचक मुकाबले में दर्शक भी खिलाड़ियों के साथ सांसें थामे रहे।

एकता और परंपरा का प्रतीक है दड़ा खेल

बरूंधन गांव में हाड़ा जाति के करीब 60 परिवार निवास करते हैं। उनके पूर्वजों ने ही युवाओं की ताकत, साहस और सामूहिक एकता को परखने के उद्देश्य से दड़ा खेल की शुरुआत की थी। समय के साथ यह खेल पूरे इलाके की पहचान बन गया। दड़ा खेल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें जाति, वर्ग, अमीर-गरीब या छोटे-बड़े का कोई भेदभाव नहीं होता। ढोल की तेज थाप सुनते ही खिलाड़ियों की थकान जैसे गायब हो जाती और वे फिर पूरी शक्ति से दड़े को खींचने में जुट जाते।

जीत के साथ गूंजा उत्साह

अंततः एक दल दड़े को अपनी तय सीमा यानी बॉर्डर तक पहुंचाने में कामयाब रहा। जीत के बाद युवाओं ने पारंपरिक अंदाज में मूंछों पर ताव देकर अपनी खुशी और गर्व का इजहार किया। पूरे गांव में उत्सव का माहौल बन गया। बरूंधन का यह दड़ा खेल न केवल एक खेल है, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत, भाईचारे और सामूहिक शक्ति का जीवंत उदाहरण भी है, जो आज भी उसी उत्साह से निभाई जा रही है।

Related Story

    Trending Topics

    IPL
    Royal Challengers Bengaluru

    190/9

    20.0

    Punjab Kings

    184/7

    20.0

    Royal Challengers Bengaluru win by 6 runs

    RR 9.50
    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!