मकर संक्रांति पर भरतपुर के गांवों में निभती है ‘आग पर तिल चटकाने’ की अनोखी परंपरा, मौसम और समृद्धि से जुड़ा है विश्वास

Edited By Anil Jangid, Updated: 15 Jan, 2026 03:22 PM

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भरतपुर। मकर संक्रांति का नाम आते ही पतंगबाजी, तिल-गुड़ और दान-पुण्य की तस्वीर सामने आ जाती है, लेकिन भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में यह पर्व एक अनोखी लोक परंपरा के कारण खास पहचान रखता है। यहां मकर संक्रांति की सुबह “आग पर तिल चटकाने” की परंपरा निभाई...

भरतपुर। मकर संक्रांति का नाम आते ही पतंगबाजी, तिल-गुड़ और दान-पुण्य की तस्वीर सामने आ जाती है, लेकिन भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में यह पर्व एक अनोखी लोक परंपरा के कारण खास पहचान रखता है। यहां मकर संक्रांति की सुबह “आग पर तिल चटकाने” की परंपरा निभाई जाती है, जो सिर्फ एक धार्मिक रिवाज नहीं बल्कि मौसम, प्रकृति और लोक विश्वासों से गहराई से जुड़ी हुई है।

क्या है आग पर तिल चटकाने की परंपरा

ग्रामीण क्षेत्रों में मकर संक्रांति के दिन तड़के महिलाएं स्नान के बाद घर के आंगन में बने चूल्हे या आग के पास तिल डालती हैं। जैसे ही तिल आग पर गिरते हैं, उनकी चटकने की आवाज़ आती है। इस आवाज़ को शुभ संकेत माना जाता है। ग्रामीणों का विश्वास है कि तिल का अच्छे से चटकना इस बात का संकेत होता है कि सर्दी अब विदा लेने लगी है और मौसम में परिवर्तन शुरू हो गया है।

मौसम से जुड़ा है विश्वास

बुजुर्गों का कहना है कि जब आधुनिक मौसम पूर्वानुमान के साधन नहीं थे, तब लोग प्रकृति और ऐसे ही पारंपरिक संकेतों से मौसम का अनुमान लगाते थे। तिल चटकाने की परंपरा भी इसी सोच से जुड़ी मानी जाती है। यदि तिल तेज आवाज के साथ चटकते हैं तो माना जाता है कि ठंड कम होगी और आने वाला समय अनुकूल रहेगा।

महिलाओं की अहम भूमिका

इस परंपरा में महिलाओं की विशेष भूमिका होती है। घर की महिलाएं तिल चटकाते समय परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना करती हैं। कई गांवों में इसे परिवार की मंगल कामना से जोड़कर देखा जाता है। महिलाएं मानती हैं कि इस परंपरा के पालन से घर में नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है।

नई पीढ़ी को मिलती है सांस्कृतिक सीख

मकर संक्रांति के दिन बच्चे भी इस परंपरा को उत्सुकता से देखते हैं। बुजुर्ग उन्हें इसके पीछे की मान्यताएं और किस्से सुनाते हैं। इस तरह यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जा रही है। हालांकि बदलती जीवनशैली और शहरीकरण के कारण कई परंपराएं धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, लेकिन भरतपुर के कई गांवों में आज भी यह रिवाज पूरी आस्था के साथ निभाया जाता है।

लोक संस्कृति की पहचान

ग्रामीणों का मानना है कि परंपराएं केवल रस्में नहीं होतीं, बल्कि हमारी संस्कृति और पहचान होती हैं। मकर संक्रांति पर आग पर तिल चटकाने की यह अनोखी परंपरा भरतपुर की ग्रामीण लोक-संस्कृति की जीवंत मिसाल है, जो यह दिखाती है कि आधुनिकता के दौर में भी लोक विश्वास और परंपराएं आज तक लोगों के जीवन से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

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