Edited By Anil Jangid, Updated: 26 Jan, 2026 01:23 PM

अलवर। राजस्थान के अलवर जिले के प्रसिद्ध भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती जोगी को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजा गया है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार द्वारा पद्म पुरस्कारों की घोषणा के साथ ही अलवर सहित पूरे मेवात अंचल में...
अलवर। राजस्थान के अलवर जिले के प्रसिद्ध भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती जोगी को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजा गया है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार द्वारा पद्म पुरस्कारों की घोषणा के साथ ही अलवर सहित पूरे मेवात अंचल में खुशी की लहर दौड़ गई। जैसे ही यह खबर सामने आई, उनके घर पर बधाइयों का तांता लग गया और देर रात तक शुभकामनाएं देने वालों का आना-जाना लगा रहा।
गफरुद्दीन मेवाती जोगी मूल रूप से भरतपुर जिले के कैथवाड़ा गांव (वर्तमान डीग जिला) के निवासी हैं। वर्ष 1978 में वे अलवर आकर बस गए थे। बचपन से ही उन्होंने पुश्तैनी लोक वाद्य यंत्र भपंग को अपना जीवन बना लिया। वे भगवान शिव के डमरू से प्रेरित इस वाद्य यंत्र के माध्यम से महाभारत कालीन कथाओं, भर्तृहरि शतक और वैराग्य से जुड़े दोहों का गायन करते हैं। वे मेवाती भाषा में महाभारत गायन ‘पांडुन का कड़ा’ के इकलौते जीवित गायक माने जाते हैं।
गफरुद्दीन मेवाती ने बताया कि उन्होंने चार साल की उम्र से अपने पिता के साथ भपंग बजाना शुरू कर दिया था। जीवनयापन के लिए वे अलवर की गलियों में घर-घर जाकर आटा इकट्ठा करते थे और उसी से रोटी बनाकर परिवार का पेट पालते थे। उन्होंने कहा कि कभी सोचा भी नहीं था कि उनकी यह लोक कला उन्हें पद्मश्री जैसे बड़े सम्मान तक पहुंचाएगी।
अब तक वे 2,800 से अधिक लोक गीतों और दोहों को भपंग के साथ संरक्षित कर चुके हैं। उनकी कला को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय पहचान भी मिली है। वर्ष 1992 में पहली विदेश यात्रा के बाद उन्होंने इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, दुबई सहित 60 से अधिक देशों में प्रस्तुति दी। लंदन में महारानी एलिजाबेथ के जन्मदिन समारोह में भी उन्होंने भपंग वादन किया।
उनके पुत्र डॉ. शाहरुख खान मेवाती जोगी आठवीं पीढ़ी में इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं और मेवात संस्कृति पर पीएचडी कर चुके हैं। परिवार के अन्य सदस्य और बच्चे भी इस परंपरा से जुड़े हुए हैं।
पद्मश्री मिलने पर गफरुद्दीन मेवाती ने सरकार से उम्मीद जताई कि लोक कलाओं को संरक्षित करने के लिए उन्हें जमीन उपलब्ध कराई जाए, ताकि एक लोक कला विद्यालय खोला जा सके और आने वाली पीढ़ियों तक यह विरासत जीवित रह सके।